नई दिल्ली । सोमवार, 31 अगस्त 2026
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध वित्तीय गतिविधियों (Financial Crimes) से जुड़े मामलों में संपत्ति की रिकवरी की बेहद कम दर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कैम्ब्रिज (यूके) में आयोजित 43वें ‘अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक अपराध संगोष्ठी’ (International Symposium on Economic Crime) को संबोधित करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए हेर-फेर किए गए हर ₹100 में से जांच एजेंसियां केवल ₹1 की संपत्ति ही रिकवर कर पाती हैं।
CJI की यह टिप्पणी इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि आर्थिक अपराधों में अपराध की कमाई (Proceeds of Crime) को ट्रैक करना, उसे पहचानना और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत वापस पाना कितना जटिल और समय लेने वाला काम है।
1. रिकवरी इतनी मुश्किल क्यों होती है? (Key Challenges)
मनी लॉन्ड्रिंग का मुख्य मकसद अवैध तरीके से कमाए गए धन को ‘सफेद’ बनाना होता है। इसके लिए अपराधी आधुनिक तकनीक और बहुस्तरीय वित्तीय नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं:
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लेयरिंग (Layering) और शेल कंपनियां: अवैध धन को कई अलग-अलग देशों के बैंक खातों, फर्जी कंपनियों (Shell Companies) और बेनामी निवेशों में इस तरह घुमाया जाता है कि उसका मूल स्रोत पूरी तरह गायब हो जाता है।
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अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार और प्रत्यर्पण में देरी: आर्थिक अपराधी देश छोड़कर ऐसे क्षेत्रों (Tax Havens) में चले जाते हैं जहाँ से उनके प्रत्यर्पण (Extradition) और संपत्ति ज़ब्ती में कानूनी जटिलतियाँ आती हैं।
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तकनीकी माध्यम और क्रिप्टोकरेंसी: आधुनिक वित्तीय घोटालों और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे अपराधों में क्रिप्टो और डार्क वेब के इस्तेमाल से फंड ट्रेल ढूंढना और जटिल हो जाता है।
2. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का ऐतिहासिक संदर्भ
अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने प्राचीन भारतीय राजनेता कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित अर्थशास्त्र का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में भी कौटिल्य ने सरकारी राजस्व में हेराफेरी के करीब 40 तरीकों का वर्णन किया था।
“कौटिल्य ने लिखा था कि राजस्व का काम संभालने वाले अधिकारी के लिए उसमें से थोड़ा सा भी न चखना उतना ही असंभव है जितना जीभ की नोक पर शहद या जहर रखकर उसका स्वाद न लेना।” — CJI सूर्यकांत
कौटिल्य ने उस समय भी ऑडिट, क्रॉस-वेरिफिकेशन और अवैध संपत्ति की ज़ब्ती को ही इसका समाधान बताया था, जिससे पता चलता है कि आर्थिक अपराधों का मुकाबला करना मानव इतिहास में हमेशा से एक चुनौती रहा है।
3. न्यायिक व्यवस्था और जांच एजेंसियों के सामने राह
CJI ने कहा कि केवल दोषियों को जेल भेजना या उन पर मुकदमा चलाना काफी नहीं है; न्याय व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य अपराध से अर्जित धन को वापस पाना होना चाहिए।
सुधार के लिए प्रमुख सुझाव:
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त्वरित अंतरराष्ट्रीय सहयोग: विभिन्न देशों की जांच एजेंसियों के बीच ‘फॉरेंसिक फाइनेंशियल इंटेलिजेंस’ का रियल-टाइम आदान-प्रदान होना चाहिए।
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सख्त संपत्ति कुर्की कानून: दोषसिद्धि (Conviction) से पहले भी अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को फ्रीज और जब्त (Non-conviction-based forfeiture) करने की व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
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सक्रिय न्यायिक दृष्टिकोण: भारतीय न्यायपालिका ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर-वित्तीय अपराधों जैसे उभरते खतरों पर संसद द्वारा कानून बनाने का इंतजार किए बिना स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर दिशा-निर्देश जारी कर रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. CJI सूर्यकांत ने मनी लॉन्ड्रिंग रिकवरी पर क्या टिप्पणी की?
उत्तर: CJI सूर्यकांत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए हेर-फेर किए गए कुल धन में से जांच एजेंसियां वैश्विक स्तर पर हर ₹100 में से लगभग ₹1 ही वसूल पाने में सफल होती हैं।
Q2. मनी लॉन्ड्रिंग में संपत्ति रिकवर करना कठिन क्यों है?
उत्तर: पैसों को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार घुमाने, फर्जी (सेल) कंपनियों के इस्तेमाल, बेनामी संपत्तियों और क्रिप्टोकरेंसी जैसे माध्यमों के कारण अपराधियों के असली नेटवर्क का पता लगाना बेहद कठिन होता है।
Q3. CJI ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उदाहरण क्यों दिया?
उत्तर: यह दर्शाने के लिए कि वित्तीय अपराध और राजस्व में हेराफेरी प्राचीन काल से चली आ रही चुनौती है, और इसके समाधान के लिए सदियों पहले भी सख्त ऑडिटिंग और संपत्ति जब्ती का समर्थन किया गया था।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध समाचारों, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के बयानों और कानूनी विश्लेषणात्मक संदर्भों के आधार पर केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है।