पीओके के रावलकोट में फूटा जनता का गुस्सा: खुले मंच से कहा— ‘कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, हम तानाशाही बर्दाश्त नहीं करेंगे’

मुजफ्फरराबाद | मंगलवार, 30 जून 2026

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब एक खुली बगावत का रूप ले चुका है। नियंत्रण रेखा (LoC) के करीब स्थित रावलकोट शहर से सामने आए एक हालिया वीडियो ने पाकिस्तान के हुक्मरानों और सैन्य मुख्यालय (GHQ) रावलपिंडी की रातों की नींद उड़ा दी है। अवामी एक्शन कमेटी (AAC) के नेतृत्व में चल रहे इन ऐतिहासिक प्रदर्शनों में अब केवल आर्थिक मांगें नहीं उठ रही हैं, बल्कि सीधे तौर पर पाकिस्तान की संप्रभुता को खारिज किया जा रहा है।

रावलकोट में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए एक स्थानीय कश्मीरी नेता ने पाकिस्तानी सेना और वहां के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को दो टूक लहजे में चेतावनी दी। उन्होंने खुले मंच से गरजते हुए कहा, “ये जो कहते हैं कि कश्मीरी पहले वफादारी करते थे, तो मैं डंके की चोट पर कहता हूं कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है।”

‘हमें तुम्हारे राशन की जरूरत नहीं, कोई मार्शल लॉ स्वीकार नहीं’

प्रदर्शनकारियों का यह गुस्सा उस समय फूटा जब पाकिस्तानी प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए गेहूं की सब्सिडी और राशन की आपूर्ति रोकने की धमकी दी। इसका जवाब देते हुए वीडियो में कश्मीरी प्रदर्शनकारी कहता है:

“सीजफायर लाइन (LoC) पर हमारी पत्नियां और बच्चे धरने पर बैठे हैं। तुम कहते हो हमारा राशन बंद करोगे? हमें तुम्हारे राशन की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि तुम्हें (पाकिस्तान को) हमारी जरूरत है। थोड़ा होश में आओ, कहीं ऐसा न हो कि हमारे लिए दूसरे रास्ते खुल जाएं और फिर तुम हमारे सामने मिन्नतें करते फिरो।”

यहाँ ‘दूसरे रास्ते’ से प्रदर्शनकारी का सीधा और परोक्ष इशारा भारत की तरफ था। पीओके की जनता अब खुलकर यह स्वीकार कर रही है कि उनका असली भविष्य और विकास भारत के साथ ही सुरक्षित है। कश्मीरी आवाम ने साफ कर दिया कि वे किसी भी सैन्य तानाशाह (डिक्टेटर) के सामने नहीं झुकेंगे और पीओके में किसी भी प्रकार का मार्शल लॉ स्वीकार नहीं किया जाएगा।

पाकिस्तानी सेना के ट्विटर प्रोपेगैंडा पर तीखा तंज

भाषण के दौरान पाकिस्तानी सेना के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) और उनके सोशल मीडिया सेल पर भी तीखा हमला बोला गया। प्रदर्शनकारी ने कहा, “जैसे किसी ने बंदर के हाथ में माचिस दे दी हो और उसने सब तरफ आग लगा दी, वैसे ही इनके हाथ में किसी ने मोबाइल और ट्विटर (X) दे दिया है। ये दिन-रात बस वफादारी का रोना रोते रहते हैं।”

उन्होंने पाकिस्तानी हुकूमत को नसीहत देते हुए कहा कि कश्मीरियों से वफादारी मांगने से पहले वे पाकिस्तान के अपने मेहनतकश मजदूरों, बदहाल जनता और परेशान नागरिकों की फिक्र करें। पाकिस्तान को पहले अपने लोगों को बुनियादी तालीम (शिक्षा), रोजगार, इंसाफ और जीने का अधिकार देना चाहिए।

आर्थिक बदहाली से राजनीतिक स्वायत्तता की ओर मुड़ा आंदोलन

शुरुआत में यह आंदोलन बिजली के भारी-भरकम बिलों, आटे-गेहूं पर सब्सिडी खत्म किए जाने और बेतहाशा महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ था। अवामी एक्शन कमेटी (Awami Action Committee) के बैनर तले आम नागरिकों, व्यापारियों और वकीलों ने लामबंद होना शुरू किया था।

लेकिन, पाकिस्तानी रेंजरों और पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर किए गए हिंसक दमन के बाद अब यह आंदोलन ‘पूर्ण राजनीतिक स्वायत्तता’ की मांग में बदल गया है। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि पीओके के संसाधनों (जैसे जल विद्युत) का इस्तेमाल पाकिस्तान अपने पंजाब प्रांत के लिए करता है, जबकि यहाँ के लोग अंधेरे और गरीबी में रहने को मजबूर हैं। अब मांग यह है कि पीओके से जुड़े तमाम फैसले केवल और केवल यहाँ की स्थानीय जनता ही करेगी।

निष्कर्ष:

पीओके के रावलकोट और मुजफ्फरराबाद की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि संगीनों के साये में किसी आवाम को हमेशा के लिए गुलाम नहीं रखा जा सकता। सेना का डर पूरी तरह से खत्म हो चुका है, और “कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है” का यह नारा आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) में एक बड़ा यू-टर्न साबित हो सकता है।

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