मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप: पूर्व सहयोगियों ने ही खोली अमेरिका से हुई ‘गुप्त डील’ की पोल

ढाका । बुधवार, 27 मई 2026

बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद भी हलचल शांत होने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में समाप्त हुए 18 महीने के अंतरिम शासन के बाद, अब नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और पूर्व मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) अपने ही पूर्व करीबियों और कैबिनेट सहयोगियों के निशाने पर आ गए हैं। उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने देश में व्यवस्था सुधारने और बदलाव लाने के वादे के साथ सत्ता संभाली थी, लेकिन परदे के पीछे अपने व्यक्तिगत हितों को साधा और देश को आर्थिक नुकसान में धकेला।

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा विस्फोट अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के पूर्व सलाहकार तौहीद हुसैन (Md. Touhid Hossain) के बयानों से हुआ है, जिन्होंने अमेरिका के साथ हुई एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील ‘ट्रेड डील’ की प्रक्रिया पर गंभीर उंगली उठाई है।

क्या है अमेरिका के साथ हुई गुप्त डील का खेल?

तौहीद हुसैन ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान खुलासा किया कि जब अमेरिका के साथ व्यापार समझौता (Trade Deal) फाइनल किया जा रहा था, तब देश के विदेश मंत्रालय या खुद विदेश मामलों के सलाहकार को इस पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनभिज्ञ यानी दूर रखा गया था।

हुसैन के अनुसार, इस डील को बेहद गुप्त तरीके से वाणिज्य मंत्रालय और तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) खलीलुर रहमान ने संभाला था। हैरानी की बात यह है कि खलीलुर रहमान अंतरिम सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के ठीक बाद बनी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की नई सरकार में विदेश मंत्री बन गए।

पूर्व विदेश सलाहकार ने आशंका जताई है कि:

“इस डील के पीछे कोई बहुत बड़ा गुप्त कारण या बाहरी दबाव हो सकता है, जिसके आगे अंतरिम प्रशासन को झुकना पड़ा। यदि कोई बड़ी मजबूरी नहीं थी, तो आम चुनाव से ठीक तीन दिन पहले इतने बड़े रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर करने की क्या जरूरत थी? इसे आने वाली चुनी हुई सरकार के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए था।”

‘किचन कैबिनेट’ और छात्र नेताओं ने भी खड़े किए सवाल

मोहम्मद यूनुस पर केवल विदेशी मामलों में ही एकाधिकार चलाने के आरोप नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी ‘किचन कैबिनेट’ (अति-करीबी मंत्रियों का समूह) के सदस्य भी अब उनके फैसलों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं।

  • आसिफ नजरुल (Asif Nazrul): यूनुस सरकार के सबसे करीबी माने जाने वाले कानून सलाहकार आसिफ नजरुल ने दावा किया है कि इस व्यापार समझौते से जुड़ी किसी भी उच्च स्तरीय चर्चा या बैठक में उन्हें आमंत्रित तक नहीं किया गया था।

  • आसिफ महमूद (Asif Mahmud): पूर्व छात्र आंदोलन के अग्रणी नेता और यूनुस कैबिनेट में शामिल रहे आसिफ महमूद शोजिब भुइयां ने भी अंतरिम सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि सरकार के भीतर बड़े फैसले कैसे लिए जा रहे थे, इसकी कोई पारदर्शिता (Transparency) नहीं थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस डील को अमलीजामा पहनाते समय राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कई चिंताओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। आसिफ महमूद ने अब इस पूरे समझौते की उच्च स्तरीय समीक्षा (Review) करने की मांग की है।

आंदोलनकारी छात्रों के साथ धोखे का आरोप

जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद, जिन युवाओं ने मोहम्मद यूनुस पर भरोसा जताकर उन्हें देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर बैठाया था, वे भी अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यूनुस ने देश में कानून-व्यवस्था और अराजकता को नियंत्रित करने के बजाय, छात्रों को सड़क पर ही रहने दिया ताकि भीड़ की हिंसा और दबाव का इस्तेमाल करके विपक्ष या विरोध में उठने वाली आवाजों को कुचला जा सके।

Fact-Check & Perspective

यद्यपि इस राजनीतिक रिपोर्ट में मोहम्मद यूनुस पर तीखे व्यक्तिगत हमले किए गए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक घटनाक्रमों और पूर्व के आंकड़ों को देखें तो इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे समझना जरूरी है:

  1. अमेरिकी टैरिफ का दबाव: वर्ष 2025 में जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नीतियों के तहत बांग्लादेशी आयातों पर भारी 37% का रेसिप्रोकल टैरिफ (पारस्परिक शुल्क) लगाने की घोषणा हुई थी, तब बांग्लादेश के गारमेंट (RMG) उद्योग और अर्थव्यवस्था पर डूबने का संकट मंडरा रहा था।

  2. सफल नेगोशिएशन: तत्कालीन मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस, खलीलुर रहमान और उनकी टीम ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (USTR) के साथ महीनों तक कठिन बातचीत की थी। इसके परिणामस्वरूप, जुलाई 2025 के अंत में अमेरिका ने बांग्लादेश पर इस टैरिफ को 35% से घटाकर 20% करने पर सहमति दी थी।

  3. संस्थागत मजबूरी या कूटनीति?: आलोचक भले ही इसे ‘गुप्त डील’ कह रहे हों, लेकिन उस समय के आर्थिक हालातों को देखते हुए अमेरिकी बाजार में बांग्लादेशी कपड़ों की पहुंच को बचाना अंतरिम सरकार के लिए एक अनिवार्य प्राथमिकता थी।

हालांकि, चुनाव से ठीक तीन दिन पहले बिना पूरी कैबिनेट को विश्वास में लिए इस पर अंतिम मुहर लगाना और इसके तुरंत बाद प्रमुख वार्ताकार खलीलुर रहमान का नई BNP सरकार में सीधे कैबिनेट मंत्री (विदेश मंत्री) बन जाना, राजनीतिक रूप से कई गंभीर और तीखे सवालों को जन्म देता है।

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