सावरकर का क्रांतिकारी नेतृत्व: कर्जन वायली की हत्या और ढींगरा का बलिदान

Saransh Kanaujia
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 20वीं सदी का पहला दशक क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है। इस क्रांति का केंद्र भारत नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की नाक के नीचे लंदन का ‘इंडिया हाउस’ था। वीर सावरकर के नेतृत्व में इस स्थान ने भारतीय युवाओं को ‘सशस्त्र क्रांति’ का नया मार्ग दिखाया।

1. इंडिया हाउस: क्रांतिकारी विचारधारा का जन्मस्थल

श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इंडिया हाउस’ केवल एक छात्रावास नहीं था, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों का प्रशिक्षण केंद्र था। 1906 में जब सावरकर वहां पहुँचे, तो उन्होंने इसे वैचारिक और सामरिक रूप से सक्रिय किया।

  • फ्री इंडिया सोसाइटी: सावरकर ने भारतीय छात्रों को एकजुट करने के लिए इसकी स्थापना की, जहाँ 1857 के शहीदों को याद किया जाता था।

  • बौद्धिक हथियार: यहीं रहकर सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक कालजयी पुस्तक लिखी। इस पुस्तक ने ब्रिटिश नैरेटिव (कि 1857 केवल एक विद्रोह था) को ध्वस्त कर उसे भारत की आजादी की पहली संगठित जंग घोषित किया।

2. मदन लाल ढींगरा: प्रतिशोध और बलिदान

सावरकर के शिष्यों में मदन लाल ढींगरा का नाम सबसे ऊपर आता है। ढींगरा एक इंजीनियरिंग छात्र थे, जो सावरकर के संपर्क में आकर पूरी तरह बदल गए।

कर्जन वायली की हत्या (1 जुलाई, 1909)

सर कर्जन वायली भारत में ब्रिटिश दमन का प्रतीक था। वह लंदन में भी भारतीय छात्रों की जासूसी करता था। सावरकर ने ढींगरा के भीतर सोए हुए राष्ट्रवाद को जगाया और उन्हें इस मिशन के लिए तैयार किया।

  • घटना: इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ढींगरा ने वायली को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।

  • सावरकर की ढाल: इस हत्या के बाद लंदन के भारतीयों ने ढींगरा की निंदा की। लेकिन सावरकर ने भरी सभा में उठकर ढींगरा का समर्थन किया और कहा, “न्याय से पहले उसे दोषी कहना गलत है।” सावरकर के इस साहस ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया।

3. गिरफ्तारी और ‘मार्सेल’ की ऐतिहासिक समुद्र-छलांग

कर्जन वायली की हत्या और भारत में हो रहे नासिक षड्यंत्र केस के तार सावरकर से जुड़े होने के कारण, ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1910 में लंदन में गिरफ्तार कर लिया। उन्हें भारत ले जाने के लिए ‘एस.एस. मोरिया’ जहाज पर चढ़ाया गया।

वह क्षण जिसने इतिहास बदल दिया (8 जुलाई, 1910)

जब जहाज फ्रांस के मार्सेल बंदरगाह पर रुका, तो सावरकर ने भागने की एक साहसी योजना बनाई।

  1. छलांग: सुबह के समय, वे शौचालय की खिड़की (Porthole) के छोटे से छेद से बाहर निकलकर अथाह समुद्र में कूद गए।

  2. तैरने का संघर्ष: गोलियों की बौछार के बीच वे तैरते हुए फ्रांस की धरती पर पहुँच गए।

  3. अंतरराष्ट्रीय विवाद: फ्रांस की धरती पर उन्हें गिरफ्तार करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था। हालांकि उन्हें दोबारा पकड़ लिया गया, लेकिन इस घटना ने सावरकर को पूरी दुनिया में एक नायक बना दिया। यह मामला नीदरलैंड के ‘हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय’ तक गया।

4. राष्ट्रवाद की अमर विरासत

सावरकर का लंदन प्रवास और ढींगरा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। इसने सिद्ध कर दिया कि भारतीय अब केवल याचना नहीं, बल्कि प्रत्युत्तर देना जानते हैं।

  • सावरकर की लेखनी ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को वैचारिक खाद दी।

  • ढींगरा के बलिदान ने ब्रिटिश प्रशासन के भीतर सुरक्षा का डर पैदा कर दिया।

  • मार्सेल की छलांग ने भारतीय स्वतंत्रता के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुँचा दिया।

सावरकर को बाद में दोहरे आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा मिली, लेकिन उनकी जलाई मशाल ने अंततः 1947 के सूर्योदय का मार्ग प्रशस्त किया।

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