महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल: ‘ऑपरेशन टाइगर’ के बाद MVA की बैठक से 23 विधायक गायब, क्या टूटने वाला है महा विकास अघाड़ी गठबंधन?

मुंबई । गुरुवार, 25 जून 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में शह-मात का खेल एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है। ‘महा विकास अघाड़ी’ (MVA) गठबंधन में छिड़ी अंदरूनी जंग अब खुलकर सड़कों और बैठकों में दिखने लगी है। राज्य विधानसभा के महत्वपूर्ण मानसून सत्र (Monsoon Session 2026) की साझा रणनीति तय करने के लिए बुलाई गई विपक्षी गठबंधन की उच्च स्तरीय बैठक में जो हुआ, उसने सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज कर दी है कि वैचारिक विरोधाभासों पर टिका यह गठबंधन अब अपने अंतिम दिनों की ओर बढ़ रहा है।

इस महत्वपूर्ण बैठक में विपक्ष के कुल 60 विधायकों में से 23 विधायक अनुपस्थित रहे। इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का गायब होना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर सुलग रही बड़ी बगावत का साफ संकेत माना जा रहा है।

शरद पवार और नाना पटोले की अनुपस्थिति ने बढ़ाईं चिंताएं

इस बैठक की सबसे चौंकाने वाली बात सिर्फ विधायकों की गैरमौजूदगी नहीं थी, बल्कि महा विकास अघाड़ी के शीर्ष स्तंभों का दूरी बनाना भी रहा। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCPSP) के सुप्रीमो शरद पवार, जयंत पाटिल और कांग्रेस के कद्दावर नेता नाना पटोले जैसे दिग्गज इस रणनीति बैठक में शामिल नहीं हुए।

हालांकि, बैठक का मोर्चा संभालने के लिए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और शिवसेना (UBT) के संकटमोचक व राज्यसभा सांसद संजय राउत मौजूद थे। लेकिन विधायकों की इस सामूहिक बेरुखी ने उद्धव ठाकरे को भीतर तक झकझोर दिया है।

“क्या हम सचमुच साथ हैं?” – उद्धव ठाकरे का छलका दर्द

बैठक के दौरान अपनी ही सेना और सहयोगियों के ढुलमुल रवैए को देखकर पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अपनी पीड़ा छिपा नहीं पाए। उन्होंने सहयोगियों और मौजूद विधायकों की तरफ देखते हुए सीधे सवाल दागा:

“हम मंचों से चिल्लाकर कहते हैं कि हम साथ हैं… लेकिन क्या हम सचमुच साथ हैं? क्या हम सदन में महा विकास अघाड़ी के रूप में एकजुट होकर सरकार को घेर पाते हैं? क्या हम जनता के मुद्दों को एक सुर में उठाते हैं?”

उद्धव ठाकरे के इन तीखे और भावुक सवालों के बाद बैठक में सन्नाटा पसर गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ठाकरे का यह बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि गठबंधन के भीतर अब कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है।

‘ऑपरेशन टाइगर’ ने तोड़ी उद्धव गुट की कमर

दरअसल, विधायकों की इस सामूहिक बेरुखी के पीछे की असली स्क्रिप्ट कुछ दिन पहले ही लिखी जा चुकी थी। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल ‘शिवसेना’ ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ चलाकर उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (UBT) को अब तक का सबसे बड़ा संसदीय झटका दिया है।

उद्धव गुट के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने एक साथ पाला बदलकर एकनाथ शिंदे का दामन थाम लिया है दलबदल कानून की कार्रवाई से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने ठीक दो-तिहाई का आंकड़ा छुआ और लोकसभा स्पीकर को अपना समर्थन पत्र सौंप दिया। शिंदे खेमे में शामिल होने वाले इन 6 ‘टाइगरों’ में प्रमुख नाम शामिल हैं:

  1. ओमराजे निंबालकर (धाराशिव)

  2. संजय दीना पाटिल (मुंबई नॉर्थ-ईस्ट)

  3. संजय जाधव (परभणी)

  4. संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम)

  5. नागेश पाटिल अष्टिकर (हिंगोली)

  6. भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी)

इस बड़ी टूट के बाद संसद के निचले सदन में उद्धव ठाकरे के पास अब सिर्फ 3 सांसद बचे हैं, जिससे दिल्ली से लेकर मुंबई तक शिवसेना (UBT) के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है।

“जो गए… उन्हें जाने दो” – ठाकरे ने कार्यकर्ताओं को बंधाया ढाँस

पिछले चार सालों में दूसरी बार अपनी पार्टी में इतनी बड़ी टूट देखने के बाद भी उद्धव ठाकरे ने हार मानने से इनकार किया है। उन्होंने अपने बचे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए कहा, “जो लोग चले गए हैं… उन्हें जाने दो। हमें उन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो आज भी हमारे साथ वफादार खड़े हैं।”

ठाकरे ने आगे कहा कि महा विकास अघाड़ी के रूप में हम आज भी एक बड़ी ताकत हैं। उन्होंने हार और झटकों के बावजूद एकता दिखाने के लिए संयुक्त बैठकें करने और राज्यभर में रैलियां आयोजित करने का आह्वान किया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जून का महीना और बगावत का कनेक्शन

महाराष्ट्र की राजनीति और जून के महीने का एक अजीब और ऐतिहासिक कनेक्शन बन चुका है:

  • जून 2022: एकनाथ शिंदे ने मूल शिवसेना से बगावत की थी, जिसके कारण तत्कालीन महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई थी।

  • जून 2023: ठीक एक साल बाद, अजीत पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को तोड़कर महायुति सरकार का हाथ थाम लिया था।

  • जून 2026: अब उद्धव ठाकरे के 6 लोकसभा सांसदों ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के जरिए पार्टी छोड़ दी और ठीक इसी समय MVA के 23 विधायक बैठक से नदारद रहे।

फिलहाल किसी नए आधिकारिक विद्रोह की खबर नहीं है, और शरद पवार ने भी दावा किया है कि उनका कोई विधायक कहीं नहीं जा रहा है। लेकिन इतिहास को देखते हुए, विधायकों की यह सामूहिक बेरुखी इस बात का साफ इशारा है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में किसी और बड़े उलटफेर से इनकार नहीं किया जा सकता।

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