नई दिल्ली । शनिवार, 20 जून 2026
पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति में एक बहुत बड़ा संरचनात्मक (structural) बदलाव देखने को मिला है। अपनी रणनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए भारत ने खाड़ी देशों पर अपनी पारंपरिक निर्भरता को तेजी से कम किया है। संकट के आने से पहले तक भारत अपनी कुल एलपीजी आयात जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई सप्लायर्स से खरीदता था, जिससे देश हमेशा वहां के लॉजिस्टिक्स और सप्लाई रूट (जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में होने वाली रुकावटों के प्रति संवेदनशील बना रहता था।
क्रिसिल (CRISIL) की हालिया रिपोर्ट और घरेलू बाजार के ताजा आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भारत ने इस जोखिम को कम करने के लिए अमेरिका, ईरान और कई अन्य देशों से अपने एलपीजी इंपोर्ट को तेजी से री-राउट (Re-route) किया है।
अमेरिका से आयात में ऐतिहासिक उछाल
सप्लाई के स्रोतों में विविधता (Diversification) लाने की भारत की इस कोशिश में सबसे बड़ी मदद साल 2025 के आखिर में अमेरिका के साथ हुए एक महत्वपूर्ण समझौते से मिली। इस सालाना समझौते के तहत अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी की सप्लाई तय की गई थी, जो भारत की कुल वार्षिक आयात जरूरत का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है।
क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। फरवरी 2026 तक भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी महज 8 प्रतिशत थी, जो अप्रैल 2026 तक तेजी से बढ़कर लगभग एक-तिहाई (33 प्रतिशत) पर पहुंच गई।
इसके अलावा, भारत के पारंपरिक सप्लायर्स की सूची में ईरान की भी वापसी हुई है, जिसकी अप्रैल के कुल आयात में हिस्सेदारी करीब 6 प्रतिशत दर्ज की गई। भारत ने केवल यहीं तक सीमित न रहकर अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे गैर-पारंपरिक देशों से भी एलपीजी की खेप मंगवाई है।
लंबी सप्लाई चेन और बढ़े ढुलाई खर्च (Freight Cost) की चुनौती
हालांकि, स्रोतों में इस विविधता ने संकट के दौरान देश में गैस की किल्लत तो नहीं होने दी, लेकिन इसने भारतीय तेल कंपनियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। अमेरिका और यूरोप से गैस मंगवाने के कारण जहाजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे फ्रेट कॉस्ट (समुद्री ढुलाई खर्च) और लॉजिस्टिक्स लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है।
इस बढ़ी हुई लागत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई के जोखिमों के कारण वैश्विक स्तर पर एलपीजी की कीमतों में आग लग गई। भारतीय आयात के लिए बेंचमार्क माने जाने वाले ‘सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस’ (Saudi Aramco Contract Price) में फरवरी से जून के बीच 46 प्रतिशत तक का भारी उछाल देखा गया। इस वैश्विक उछाल के कारण देश के भीतर भी मांग और खपत पर असर पड़ा; अप्रैल में भारत की एलपीजी खपत घटकर 2.47 मिलियन टन रह गई, जो फरवरी में 3.2 मिलियन टन के स्तर पर थी।
कमर्शियल और घरेलू उपभोक्ताओं पर असमान असर
आमतौर पर यह माना जाता है कि भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का 85 प्रतिशत आयात करता है, लेकिन स्वतंत्र ईंधन क्षेत्रों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर है। देश अपनी कुल घरेलू एलपीजी आवश्यकताओं का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।
वैश्विक कीमतों में आई इस 46% की तेजी का पूरा बोझ सरकार ने आम जनता की रसोई पर नहीं पड़ने दिया। कीमतों के इस अंतर को कमर्शियल और घरेलू श्रेणियों में इस तरह विभाजित किया गया:
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घरेलू एलपीजी (14.2 किलोग्राम): दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों में फरवरी से जून के बीच घरेलू एलपीजी सिलेंडर की रिटेल कीमतों में केवल 10% के आसपास की मामूली बढ़ोतरी की गई। इसके अतिरिक्त, राजकोषीय संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मिलने वाले सब्सिडी कोटा को भी री-कैलिब्रेट किया गया है।
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कमर्शियल एलपीजी (19 किलोग्राम): चूंकि कमर्शियल और इंडस्ट्रियल यूजर्स सीधे बाजार से जुड़ी कीमतों पर निर्भर करते हैं, इसलिए उन पर इसका सबसे सीधा असर पड़ा और कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में 79 प्रतिशत से भी ज्यादा की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। यही कारण है कि मार्च और अप्रैल में साल-दर-साल एलपीजी खपत में 13% और मई में 20% की बड़ी गिरावट मुख्य रूप से औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में देखी गई।
सरकारी तेल कंपनियों को ₹22,000 करोड़ की ‘अंडर-रिकवरी’ का फटका
रिटेल कीमतों (विशेषकर घरेलू श्रेणी में) को नियंत्रित रखने की इस नीति के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ा है।
लागत मूल्य और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच के इस बड़े अंतर के कारण अकेले मई के महीने में दिल्ली में प्रति घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर ‘अंडर-रिकवरी’ (लागत से कम कीमत पर बेचने से होने वाला नुकसान) ₹651 तक पहुंच गई। मार्च से मई 2026 के तीन महीनों के दौरान ही इन फ्यूल रिटेलर्स को कुल मिलाकर लगभग 22,000 करोड़ रुपए का भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है। यह नुकसान देश की खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) को काबू में रखने के लिए तेल कंपनियों द्वारा उठाया गया एक बड़ा त्याग है, जो मई 2026 में 3.93% के स्तर पर दर्ज की गई थी।
क्या कीमतों में जल्द आएगी नरमी?
राहत की बात यह है कि पश्चिम एशिया में मौजूदा तनाव धीरे-धीरे कम होने के संकेत मिल रहे हैं। जैसे-जैसे मुख्य वैश्विक ट्रेड रूट्स और शिपिंग लेंस पूरी तरह खुलेंगे, सप्लाई को लेकर बनी तात्कालिक चिंताएं दूर होने लगेंगी। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में ग्लोबल एलपीजी कीमतों में नरमी आएगी, जिससे भारतीय तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी कम होगी और उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है।
हालांकि, 2026 के इस ऊर्जा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भू-राजनीतिक उथल-पुथल, फ्रेट मार्केट के उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के झटके भारतीय अर्थव्यवस्था को कितनी गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।
