केरल राजनीति में बीजेपी का उभार: ‘नंबर 3’ का वो खौफ जिसने कम्युनिस्ट किले की दीवारें हिला दीं

तिरुवनंतपुरम । शुक्रवार, 19 जून 2026

देश के अन्य राज्यों में जहां ऑपरेशन लोटस, दलबदल, और विपक्षी पार्टियों के टूटने की खबरें आम हो चुकी हैं, वहीं सुदूर दक्षिण के राज्य केरल की राजनीतिक जमीन कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी का टूटना हो, या पश्चिम बंगाल और दिल्ली-पंजाब में राजनीतिक फेरबदल—इन सब से इतर केरल में नेताओं का कोई अचानक से बड़ा दलबदल नहीं हो रहा। इसके विपरीत, जमीन पर कैडरों और पारंपरिक वोट बैंक की एक बेहद खामोश लेकिन प्रभावी ‘साइलेंट माइग्रेशन’ (Silent Migration) चल रही है—यानी जमीनी कार्यकर्ताओं का ‘लाल’ से ‘भगवा’ की ओर झुकाव।

क्या है ‘नंबर 3’ का खौफ?

140 सीटों वाली केरल विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रत्यक्ष रूप से महज 3 सीटें जीतना ऊपरी तौर पर मामूली लग सकता है, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) के लिए यह खतरे का सबसे बड़ा अलार्म है। हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को पिछले चुनाव की 99 सीटों से सीधे 35 सीटों पर लाकर पटक दिया है। इस बड़ी हार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) ने 102 सीटें जीतकर शानदार वापसी की है।

इस ऐतिहासिक हार की आंतरिक समीक्षा के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने जो 47 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है, उसमें से पूरे 3 पन्ने सिर्फ इसी बात पर केंद्रित हैं कि बीजेपी ने ये 3 सीटें कैसे जीतीं और वह राज्य में ‘तीसरी बड़ी ताकत’ के रूप में कैसे स्थापित हो रही है। इन 3 जीतों के अलावा, राज्य की लगभग 50 सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी के उम्मीदवारों ने मजबूत वोट शेयर हासिल कर पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

‘हिंदू पार्टी’ वाली छवि टूटी, कोर वोट बैंक खिसका

केरल में CPI(M) की सबसे बड़ी ताकत (USP) यह थी कि उसे हिंदू समाज, विशेष रूप से इझवा (Ezhavas) समुदाय का एकमुश्त और पारंपरिक समर्थन मिलता था। इझवा समाज केरल का सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जिसका दक्षिणी और मध्य जिलों में भारी राजनीतिक प्रभाव है।

पार्टी की अंदरूनी रिपोर्ट मानती है कि बीजेपी अब केवल ‘उच्च जातियों की पार्टी’ नहीं रही। भगवा दल ने केरल के इस सबसे बड़े पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के कोर वोट बैंक में गहरी सेंध लगा दी है। इझवा समुदाय के युवाओं और जमीनी कार्यकर्ताओं का झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा से हटकर राष्ट्रवाद की ओर होना लेफ्ट के लिए वैचारिक और चुनावी, दोनों मोर्चों पर सबसे बड़ा आघात है।

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसा डर

कम्युनिस्ट रणनीतिकारों को केरल में बीजेपी के इस उभार में पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा का भूत दिखाई दे रहा है। इतिहास गवाह है कि:

  1. पश्चिम बंगाल: यहां भी बीजेपी पहले ‘नंबर 3’ की मामूली ताकत थी। लेकिन जैसे ही वामपंथ का कैडर खिसका, बीजेपी मुख्य विपक्ष बनी और आज वहां लेफ्ट शून्य पर सिमट चुका है।

  2. त्रिपुरा: कांग्रेस के कमजोर होने के बाद बीजेपी ने सीधे लेफ्ट के कैडर वोट बैंक को अपने पाले में किया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

केरल वर्तमान में पूरे भारत का एकमात्र ऐसा राज्य बचा है जहाँ वामपंथ की सरकार (हालिया चुनाव से पहले तक) अस्तित्व में थी। ऐसे में ‘तीसरी ताकत’ का यह मौन उभार कम्युनिस्टों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।

राजनीतिक विश्लेषकों का क्या है कहना?

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, केरल के मतदाता अब पारंपरिक एलडीएफ-यूडीएफ के बारी-बारी से सत्ता में आने के चक्र से आगे देखना चाहते हैं। केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की सीधी पहुंच और स्थानीय स्तर पर ईसाइयों व हिंदुओं के बीच बदलते सामाजिक समीकरणों का सीधा फायदा बीजेपी को मिल रहा है। नेमोम (Nemom), कझाकुट्टम (Kazhakoottam) और चथन्नूर (Chathannoor) जैसी सीटों पर बीजेपी की मजबूत मौजूदगी इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि राज्य अब द्विध्रुवीय (Bi-polar) राजनीति से निकलकर त्रि-शंकु (Triangular) राजनीति के दौर में प्रवेश कर चुका है।

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