एर्णाकुलम | शुक्रवार, 19 जून 2026
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद केरल के समृद्ध मालाबार या कोचीन यहूदी समुदाय के अधिकांश परिवारों के इजरायल चले जाने के बाद, अब राज्य में एक नया और ऐतिहासिक आनुवंशिक मोड़ देखने को मिल रहा है। केरल के कुन्नमकुलम-एर्णाकुलम क्षेत्र में रहने वाले सीरियन ईसाई (Syrian Christian) समुदाय में अपने यहूदी पूर्वजों की जड़ों से जुड़ने की एक अभूतपूर्व ललक देखी जा रही है। अपनी मौखिक परंपराओं और सदियों पुराने पारिवारिक इतिहास को प्रामाणिक वैज्ञानिक आधार देने के लिए इस समुदाय के लोग अब अपने संभावित यहूदी डीएनए (DNA) की वैज्ञानिक जांच करा रहे हैं।
इस ऐतिहासिक और वैज्ञानिक मिशन के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं निदान केंद्र (CDFD), हैदराबाद के उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने हाल ही में केरल का दौरा किया और स्थानीय लोगों के 100 से अधिक स्वैच्छिक आनुवंशिक नमूने (DNA Samples) एकत्र किए हैं। इस कदम ने देश के सामाजिक और जनसांख्यिकीय हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है, और कुछ जानकार इसकी तुलना मणिपुर-मिजोरम के ‘बनेई मेनाशे’ घटनाक्रम से भी करने लगे हैं।
‘डायस्पोरा’ सेमिनार और आनुवंशिक नमूनों का संग्रह
इस पूरे वैज्ञानिक अभियान की शुरुआत बीते 23 मई को कुन्नमकुलम के अरथाट बिशप हाउस में आयोजित ‘डायस्पोरा’ नामक एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार से हुई। इस सेमिनार का मुख्य उद्देश्य केरल के इस विशिष्ट समुदाय के प्रवासन इतिहास और उनकी सांस्कृतिक विरासत के अंतर्संबंधों को आनुवंशिक स्तर पर समझना था।
वैज्ञानिक टीम का नेतृत्व बीएचयू के जूलॉजी विभाग के प्रख्यात जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने किया। उनके साथ टीम में निम्नलिखित प्रमुख विशेषज्ञ शामिल थे:
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डॉ. मिनी कारियप्पा: प्रोफेसर एवं अनाटामी विभागाध्यक्ष, आमला इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (त्रिशूर), जिन्होंने इस विषय पर एक महत्वपूर्ण शोध पत्र भी प्रस्तुत किया।
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डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह और शैलेश देसाई: प्रख्यात वैज्ञानिक, सीडीएफडी (CDFD) हैदराबाद।
इस सेमिनार की अध्यक्षता मलंकारा आर्थोडाक्स सीरियन चर्च कुन्नमकुलम डायोसीज के मेट्रोपालिटन डॉ. पुलिक्कोट्टिल गीवर्गीस मार यूलियोस ने की। इस अवसर पर केरल के पूर्व डीजीपी व ‘रॉ’ (RAW) के पूर्व प्रमुख हार्मिस थरकन, पूर्व जीएसटी कमिश्नर डॉ. जॉन जोसफ और मलप्पुरम की पुलिस अधीक्षक चैत्रा तेरेसा जॉन सहित कई गणमान्य नागरिक मौजूद थे। सेमिनार के दौरान ही वैज्ञानिकों ने पंजीकृत और इच्छुक स्थानीय निवासियों के 100 से अधिक ब्लड व लार के स्वैच्छिक सैंपल एकत्र किए।
क्या है सीरियन ईसाइयों का यहूदी जुड़ाव? (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)
स्थानीय इतिहासकार, पत्रकार और आयोजन समिति के सदस्य बीनू एलेक्स के अनुसार, केरल के सीरियन ईसाइयों (जिन्हें ‘नासरानी’ भी कहा जाता है) का इतिहास सीधे तौर पर मध्यपूर्व और प्राचीन इजरायल से जुड़ा है। मान्यताओं के अनुसार:
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व्यापारिक संबंध: ईसा पूर्व (B.C.) के कालखंड में बड़े पैमाने पर यहूदी व्यापारी मसालों के व्यापार के सिलसिले में मालाबार तट (वर्तमान केरल) आए थे।
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रोमन साम्राज्य का प्रभाव: जब यरुशलम और इजरायल पर रोमन साम्राज्य का कब्जा हुआ और यहूदियों पर अत्याचार बढ़े, तो कई यहूदी वापस लौटने के बजाय यहीं रुक गए और स्थानीय आबादी का हिस्सा बन गए।
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सेंट थॉमस का आगमन: ईसा पश्चात 52 ईस्वी (52 AD) में जब ईसा मसीह के शिष्य सेंट थॉमस (St. Thomas) केरल के मुज़िरिस तट पर पहुंचे, तो उन्होंने सबसे पहले इन्हीं स्थानीय यहूदी वंशजों और कुछ कुलीन परिवारों को ईसाई मत में दीक्षित किया। यही कारण है कि सीरियन ईसाइयों के रीति-रिवाजों, विवाह पद्धतियों और पारिवारिक संरचनाओं में आज भी यहूदी परंपराओं की स्पष्ट झलक मिलती है।
यह भी पढ़ें: सदियों पहले केरल में फल-फूल रहा ‘कोचीन यहूदी’ या ‘मालाबार यहूदी’ समुदाय आज लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। वर्ष 1948 में इजरायल देश की स्थापना के बाद, 1950 से 1970 के दशकों में अधिकांश यहूदी परिवार केरल छोड़कर इजरायल चले गए। आज कोच्चि में केवल मुट्ठी भर यहूदी ही बचे हैं, जिनकी ऐतिहासिक उपस्थिति की गवाही कोच्चि का भव्य पारदेसी सिनेगाग (Paradesi Synagogue) आज भी दे रहा है।
क्या केरल में दोहराएगा मणिपुर-मिजोरम का इतिहास?
सीरियन ईसाइयों के इस आनुवंशिक परीक्षण ने भारत के अन्य समुदायों के बीच मणिपुर और मिजोरम के ‘बनेई मेनाशे’ (Bnei Menashe) समुदाय की यादें ताजा कर दी हैं।
| विशेषता | बनेई मेनाशे (पूर्वोत्तर) | सीरियन ईसाई (केरल – वर्तमान जांच) |
| मूल धर्म | ईसाई मत का पालन करते थे | सीरियन ईसाई परंपरा का पालन |
| ऐतिहासिक दावा | इजरायल की ‘खोई हुई 10 जनजातियों’ के वंशज | प्राचीन मालाबार यहूदी व्यापारियों के वंशज |
| इजरायल प्रवासन | 1990 के दशक से चरणों में इजरायल में पुनर्वास | जांच प्रारंभिक; भविष्य में स्वेच्छा पर निर्भर |
| सहयोगी संस्थाएं | ‘शेवी इजरायल’ और इजरायल सरकार | वर्तमान में विशुद्ध वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अनुसंधान |
हालांकि, केरल के स्थानीय विचारकों और समुदाय के सदस्यों का स्पष्ट कहना है कि इसे मणिपुर या मिजोरम के चश्मे से देखना पूरी तरह ठीक नहीं होगा। उनका मुख्य उद्देश्य किसी राजनीतिक या धार्मिक प्रवासन के बजाय केवल अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और आनुवंशिक जड़ों (Roots) को जानने की एक स्वाभाविक जिज्ञासा है।
वैज्ञानिकों का क्या मानना है?
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम अब इन 100 से अधिक नमूनों का गहन आणविक और डीएनए विश्लेषण (Advanced Molecular Analysis) करेगी। प्रो. चौबे के अनुसार, इस शोध का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप की जनसांख्यिकी, प्रवासन के इतिहास, विभिन्न समुदायों के बीच आनुवंशिक संबंधों और भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को विज्ञान के माध्यम से अधिक सटीकता से समझना है।
हालांकि, कुछ जीन वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि यदि आनुवंशिक परिणामों में मध्यपूर्वी या शुद्ध यहूदी मूल (Middle Eastern / Jewish Ancestry) की पुष्टि ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ होती है, तो निश्चित रूप से इस समुदाय के कई लोग भावनात्मक और ऐतिहासिक कारणों से अपने मूल वतन यानी इजरायल की ओर स्वेच्छा से लौटने की राह पकड़ सकते हैं। आने वाले समय में इन सैंपलों की रिपोर्ट भारत और इजरायल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों में एक नया अध्याय लिख सकती है।
