भोपाल | शनिवार, 18 अप्रैल 2026
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में शुक्रवार की रात आस्था और उत्सव का एक अनूठा संगम देखने को मिला। शहर की सड़कों पर जब किन्नर समाज की भव्य शोभायात्रा निकली, तो पूरा शहर नृत्य और भजनों की थाप पर झूम उठा। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि किन्नर समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और ‘सनातन धर्म’ से जोड़ने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा बना।
नजर बाग मंदिर में गूंजा भक्ति का स्वर
शोभायात्रा का समापन शहर के प्रसिद्ध नजर बाग मंदिर में हुआ। यहाँ भोपाल से आईं प्रमुख किन्नर काजल किन्नर के नेतृत्व में समाज के लोगों ने माता रानी की विशेष आरती और पूजा-अर्चना की।
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विशेष भेंट: समाज की सुख-समृद्धि और जनकल्याण की कामना करते हुए मंदिर में एक भारी पीतल का घंटा भेंट किया गया।
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उत्साह: प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए किन्नरों ने देर रात तक मंदिर परिसर में नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय लोग एकत्रित हुए।
‘घर वापसी’ और सनातन धर्म पर जोर
इस आयोजन के दौरान काजल किन्नर का बयान चर्चा का विषय बना रहा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में समाज के भीतर चल रही धार्मिक जागरूकता की ओर इशारा किया।
“हमारा मुख्य उद्देश्य किन्नर समाज को सनातन धर्म से जोड़ना है। हाल के समय में ऐसी खबरें आईं कि समाज के कुछ लोग भटककर अन्य धर्मों की ओर जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि हर किन्नर हिंदू परंपराओं के अनुसार जीवन जिए और अपने प्राचीन अस्तित्व को गौरवान्वित महसूस करे।”
गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों से मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में किन्नर समाज के भीतर ‘घर वापसी’ और जबरन धर्मांतरण के विरुद्ध एक मुखर अभियान (जिसे स्थानीय स्तर पर ‘किन्नर जिहाद’ के खिलाफ अभियान भी कहा जा रहा है) तेज हुआ है। टीकमगढ़ की यह शोभायात्रा उसी कड़ी का एक हिस्सा मानी जा रही है।
अगले महीने भोपाल में महाकुंभ की तैयारी
काजल किन्नर ने एक बड़ी घोषणा करते हुए बताया कि मई 2026 में राजधानी भोपाल में किन्नर समाज का एक विशाल राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है।
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अनुमानित संख्या: इस सम्मेलन में देशभर से लगभग 2,500 से अधिक किन्नरों के जुटने की उम्मीद है।
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एजेंडा: इस महा-आयोजन में समाज की एकता, सनातन धर्म के प्रचार और किन्नरों के सामाजिक अधिकारों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।
सामाजिक प्रभाव
टीकमगढ़ में हुए इस आयोजन ने यह संदेश दिया है कि किन्नर समाज अब अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति पहले से अधिक सजग है। स्थानीय लोगों ने भी इस यात्रा का फूलों से स्वागत किया, जो समाज में बढ़ती स्वीकार्यता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है।
