आत्महत्या का समझौता (Suicide Pact): जीवित बचे साथी को मिलेगी जेल, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Saransh Kanaujia
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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि यदि दो व्यक्ति साथ में आत्महत्या करने का समझौता (Suicide Pact) करते हैं, तो जीवित बचने वाला साथी दूसरे को आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराधी माना जाएगा। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने दक्षिण भारतीय अभिनेत्री प्रत्यूषा की मौत के मामले में उनके साथी गुडिपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी को दोषी ठहराते हुए उनकी दो साल की जेल की सजा बरकरार रखी है।

मुख्य कानूनी बिंदु: ‘उकसाना’ केवल साधन देना नहीं

अदालत ने अपने फैसले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 107 और 306 की विस्तृत व्याख्या की। कोर्ट के अनुसार:

  • आत्महत्या के लिए उकसाना केवल जहर या हथियार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है।

  • साथ मरने का आपसी वादा, मनोवैज्ञानिक भरोसा और एक-दूसरे को हिम्मत देना भी ‘उकसाने’ (Abetment) के दायरे में आता है।

  • कोर्ट ने माना कि रेड्डी का व्यवहार सीधे तौर पर अभिनेत्री की आत्महत्या में मददगार साबित हुआ।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2002 का है जब तेलुगु फिल्मों की उभरती अभिनेत्री प्रत्यूषा और उनके मित्र सिद्धार्थ रेड्डी ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की थी।

  1. पृष्ठभूमि: दोनों इंजीनियरिंग के छात्र थे और विवाह करना चाहते थे, लेकिन रेड्डी के परिवार के कड़े विरोध के कारण उन्होंने जान देने का फैसला किया।

  2. घटना: 23 फरवरी 2002 को दोनों ने सॉफ्ट ड्रिंक में ‘नुवाक्रॉन’ नामक कीटनाशक मिलाकर पी लिया। इलाज के दौरान रेड्डी बच गए, जबकि प्रत्यूषा की मृत्यु हो गई।

  3. जांच: जांच में पाया गया कि घटना से कुछ समय पहले रेड्डी ने ही हैदराबाद की एक दुकान से वह कीटनाशक खरीदा था।

कोर्ट का आदेश और अन्य आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने रेड्डी को चार हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है ताकि वह अपनी शेष सजा काट सकें। हालांकि, अदालत ने प्रत्यूषा की मां द्वारा रेड्डी पर लगाए गए हत्या और बलात्कार के आरोपों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि इन गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं।

कानूनी सफर (Timeline)

  • सेशंस कोर्ट: शुरुआत में रेड्डी को 5 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी।

  • आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट (2011): हाई कोर्ट ने सजा घटाकर 2 साल कर दी थी।

  • सुप्रीम कोर्ट (2026): हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए रेड्डी की अपील खारिज कर दी गई।

निष्कर्ष: यह फैसला समाज में एक कड़ा संदेश देता है कि भावनात्मक दबाव या आपसी वादे के तहत किसी को अपनी जान लेने के लिए प्रेरित करना एक गंभीर अपराध है, और कानून इसमें किसी भी प्रकार की रियायत नहीं देगा।

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