वंदे मातरम् विवाद: इंदौर की दो पार्षदों पर FIR के बाद हाईकोर्ट सख्त; जानें क्या कहता है कानून?

Saransh Kanaujia
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भोपाल | शुक्रवार,  17 अप्रैल 2026

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” के अपमान का मामला अब ‘कारण बताओ’ नोटिस से आगे बढ़कर आपराधिक धाराओं तक पहुँच गया है। हाल ही में हुए बजट सत्र के दौरान कांग्रेस की दो महिला पार्षदों द्वारा राष्ट्रगीत न गाने और सदन से वॉकआउट करने के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है।

ताजा घटनाक्रम: पुलिस ने दर्ज की FIR

15 अप्रैल 2026 को इंदौर की एमजी रोड पुलिस ने लगभग एक सप्ताह की गहन जांच और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर बड़ी कार्रवाई की है।

  • आरोपी: पार्षद फौजिया शेख अलीम और रुबीना इकबाल खान।

  • धाराएं: पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1) और धारा 3(5) के तहत मामला दर्ज किया है।

  • आरोप: इन धाराओं में विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने, धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने और साझा इरादे से किए गए कृत्य का आरोप शामिल है।

हाईकोर्ट का दखल और नोटिस

अधिवक्ता योगेश हेमनानी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले को “गंभीर अनुशासनहीनता” की श्रेणी में रखा है।

  1. कारण बताओ नोटिस: कोर्ट ने दोनों पार्षदों को व्यक्तिगत रूप से नोटिस जारी कर अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने को कहा है।

  2. शासन से जवाब तलब: कोर्ट ने केवल पार्षदों ही नहीं, बल्कि प्रमुख सचिव और गृह सचिव से भी जवाब मांगा है कि सदन की गरिमा और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के लिए क्या प्रोटोकॉल पालन किए जा रहे हैं।

विवाद की जड़: क्या हुआ था बजट सम्मेलन में?

8 अप्रैल 2026 को इंदौर नगर निगम का ₹8,455 करोड़ का बजट पेश होना था। सत्र की शुरुआत परंपरा के अनुसार “वंदे मातरम्” से हुई।

  • विरोध का तर्क: पार्षद फौजिया शेख अलीम ने राष्ट्रगीत गाने से इनकार करते हुए सभापति से पूछा, “किस कानून के तहत यह अनिवार्य है?” उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी आस्था (इस्लाम) का हवाला देते हुए निजी पसंद बताया।

  • सदन से निष्कासन: बहस बढ़ने पर निगम सभापति मुन्नालाल यादव ने फौजिया शेख को सदन से बाहर कर दिया था। इसके बाद रुबीना इकबाल खान ने भी उनका समर्थन किया, जिससे सदन में भारी हंगामा हुआ।

कानूनी और संवैधानिक स्थिति: क्या राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य है?

इस मामले ने एक पुरानी संवैधानिक बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। वर्तमान में स्थिति इस प्रकार है:

कानून/अनुच्छेद प्रावधान
अनुच्छेद 51(A) संविधान के अनुसार राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।
सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख (मार्च 2026) मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्टीकरण में कहा था कि राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) के लिए सम्मान दिखाना अनिवार्य है, लेकिन इसे गाने के लिए किसी को मजबूर (Mandatory) नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोई स्पष्ट दंडात्मक कानून न हो।
केंद्र की एडवाइजरी गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने पर इसे सभी सरकारी कार्यालयों और निकायों में ससम्मान गाने की एडवाइजरी जारी की है।

निष्कर्ष और आगे की राह

बीजेपी पार्षदों का आरोप है कि यह कृत्य जानबूझकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए किया गया, जबकि कांग्रेस इसे ‘व्यक्तिगत पसंद’ और ‘विपक्ष की आवाज दबाने’ की कोशिश बता रही है।

अब क्या होगा? * पुलिस जांच में यह सिद्ध करना होगा कि क्या पार्षदों के बयान या आचरण से वाकई समाज में नफरत फैली है।

  • हाईकोर्ट का फैसला इस बात पर मुहर लगाएगा कि क्या नगर निगम जैसे वैधानिक निकायों के भीतर राष्ट्रगीत को अनिवार्य प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है या नहीं।

यह मामला आने वाले समय में अभिव्यक्ति की आजादी बनाम राष्ट्रीय गरिमा के बीच एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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