48 साल बाद जागा कानून: अरुणाचल प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (APFRA) लागू करने की तैयारी, जानिए पूरा विवाद

ईटानगर । सोमवार, 15 जून 2026

पूर्वोत्तर और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश से एक बड़ा और संवेदनशील राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम सामने आ रहा है। राज्य में करीब 48 साल पहले पारित हुए ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ (Freedom of Religion Act – APFRA, 1978) को अब पूरी तरह धरातल पर उतारने की तैयारी कर ली गई है। जनता पार्टी के शासनकाल में बने इस कानून को करीब पांच दशकों तक ठंडे बस्ते में रखने के बाद, वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार इसे अमल में ला रही है।

इस कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य की पारंपरिक जनजातीय संस्कृतियों की रक्षा करना और बलपूर्वक, धोखाधड़ी या किसी भी प्रकार के प्रलोभन (लालच) से किए जा रहे धार्मिक धर्मांतरण को रोकना है।

कानूनी मोर्चे पर नया बदलाव: नियमों का मसौदा तैयार

1978 में जब यह अधिनियम विधानसभा से पारित हुआ था, तब इसके संचालन नियम (Implementation Rules) तैयार नहीं किए गए थे। नियमों के अभाव में यह कानून केवल कागजों तक ही सीमित रहा। हाल ही में कानूनी सुधार और प्रक्रिया को गति देने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीपी कटके की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने अरुणाचल सरकार को नियमों का अंतिम मसौदा (Draft Rules) सौंप दिया है।

नोट: यहाँ यह समझना जरूरी है कि राज्य सरकार का यह कदम केवल राजनीतिक नहीं है। दरअसल, गौहाटी उच्च न्यायालय (Gauhati High Court) में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वह छह महीने के भीतर इस अधिनियम के नियमों को अंतिम रूप दे। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी स्पष्ट किया है कि यह नियम किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि मूल निवासी संस्कृतियों (Indigenous Faiths) को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए हैं।

पाँच दशकों में कैसे बदली अरुणाचल की जनसांख्यिकी (Demographics)?

इस कानून के लागू न होने की अवधि (1978 से वर्तमान तक) के दौरान राज्य की धार्मिक आबादी के संतुलन में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है। सरकारी जनगणना के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं:

1981 बनाम 2011 की जनगणना का तुलनात्मक विश्लेषण

धर्म 1981 की जनगणना (प्रतिशत) 2011 की जनगणना (प्रतिशत) वर्तमान स्थिति और प्रभाव
ईसाई (Christian) 4.32% (27,306) 30.26% (4,18,732) राज्य में सबसे बड़ा धार्मिक समूह बन चुका है।
हिंदू (Hindu) 29.24% (1,84,732) 29.04% (4,01,876) प्रतिशत के मामले में दूसरे स्थान पर खिसक गया है।
अन्य/मूल आदिवासी (जैसे डोनी-पोलो) 26.20% (3,62,569) प्रकृति पूजक और मूल जनजातीय विश्वास।
बौद्ध (Buddhist) 13.69% (86,483) लगभग स्थिर मोनपा और शेरडुकपेन जनजातियों में मुख्य रूप से।
इस्लाम (Islam) 0.80% (5,073) 1.95% (27,045) मामूली वृद्धि दर्ज।

1981 में जहां ईसाई आबादी मात्र 4.32% थी, वह 2011 तक आते-आते 30% से अधिक होकर सबसे बड़ा धार्मिक समूह बन गई। इसी बदलाव को देखते हुए ‘इंडीजीनस फेथ्स एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश’ (IFCSAP) जैसे संगठन इस कानून को तुरंत पूरी तरह लागू करने की मांग लंबे समय से कर रहे थे।

कड़ा विरोध: पीपीए और चर्च संगठनों की आपत्तियां

इस कानून के नियमों को लागू किए जाने की सुगबुगाहट के साथ ही राज्य की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दलों और धार्मिक संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है:

  • पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) का विरोध: क्षेत्रीय दल पीपीए ने इस कानून के क्रियान्वयन का तीखा विरोध किया है। पीपीए के अध्यक्ष नबाम विवेक की अध्यक्षता में एक कार्यकारी बैठक आयोजित की गई, जिसमें कानून के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया।

  • डेटा संकलन पर सवाल: नबाम विवेक ने कानून के तहत नागरिकों के धार्मिक डेटा को इकट्ठा करने की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, “कोई नागरिक किस धर्म का पालन करता है, इसका रिकॉर्ड रखने से शासन व्यवस्था को कोई लाभ नहीं होने वाला।” पार्टी ने इसके लिए विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की मांग की है।

  • अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) का विरोध: ईसाई संगठनों और चर्च निकायों ने इस कदम को मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन बताते हुए ईंटानगर में भूख हड़ताल और विरोध प्रदर्शन भी किए हैं। उनका आरोप है कि यह कानून केवल एक समुदाय विशेष को लक्षित करने के लिए लाया जा रहा है।

  • मानवाधिकार संगठन (HRA): मानवाधिकार संगठन अरुणाचल ने भी सरकार से अपील की है कि वह बीपी कटके समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार करे और इस संवेदनशील माहौल में इसे टाल दे।

निष्कर्ष

अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (APFRA) को लागू करना सीमावर्ती राज्य के ताने-बाने को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। जहां एक ओर सरकार और मूल जनजातीय रक्षक इसे स्वदेशी परंपराओं (जैसे डोनी-पोलो और प्रकृति पूजा) को बचाने का कवच मान रहे हैं, वहीं विरोधी इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मान रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पेमा खांडू सरकार सभी हितधारकों (Stakeholders) को एक साथ लाकर इस कानून को शांतिपूर्ण ढंग से कैसे लागू करती है।

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