कांकेर के बड़े परली में ग्रामसभा का बड़ा फैसला: बाहरी धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर लगी रोक, जानें पूरा विवाद

Saransh Kanaujia
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कांकेर । रविवार, 14 जून 2026

छत्तीसगढ़ का आदिवासी अंचल बस्तर इन दिनों स्थानीय संस्कृति के संरक्षण और धर्मांतरण की बहसों को लेकर देश भर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसी कड़ी में, उत्तर बस्तर कांकेर जिले के दुर्गूकोंदल विकासखंड के अंतिम छोर पर स्थित ग्राम बड़े परली से एक बड़ा मामला सामने आया है। यहां की ग्रामसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर ईसाई धर्म प्रचारकों, पादरियों और पास्टरों के गांव में प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। इसके लिए गांव के मुख्य प्रवेश द्वार पर बकायदा एक सूचना बोर्ड भी स्थापित किया गया है।

ग्रामसभा के फैसले के पीछे क्या है ग्रामीणों का तर्क?

जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए बताया कि यह कदम किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, पुरातन परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक एकजुटता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उठाया गया है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में कुछ समय से बाहरी तत्वों द्वारा प्रलोभन या अन्य माध्यमों से धर्मांतरण की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा था। धर्म परिवर्तन करने के बाद कुछ लोग गांव की पारंपरिक पूजा पद्धतियों, शीतला माता जैसे स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों की धरोहरों से दूरी बना लेते हैं। इसके कारण समाज दो धड़ों में बंटने लगा था और समय-समय पर गांवों में आपसी विवाद तथा तनाव की स्थिति निर्मित हो रही थी। इसी सामाजिक बिखराव को रोकने के लिए ‘पेसा कानून’ (PESA Act) के तहत ग्रामसभा को मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और कानूनी स्थिति

आदिवासी गांवों द्वारा बाहरी धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक लगाने के इस तरह के फैसलों को पूर्व में कुछ ईसाई संगठनों द्वारा चुनौती दी गई थी। इस विषय पर कानूनी स्थिति अब काफी हद तक स्पष्ट हो चुकी है:

  • याचिकाएं हुईं खारिज: बस्तर संभाग के विभिन्न गांवों में लगाए गए ‘प्रवेश निषेध’ संबंधी बोर्ड और ग्रामसभा के प्रस्तावों के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) और बाद में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में याचिकाएं दायर की गई थीं।

  • ग्रामसभा के अधिकारों को मान्यता: सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन्हें खारिज कर दिया। न्यायपालिका ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को अपनी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण के लिए स्वायत्त अधिकार प्राप्त हैं। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद इन सूचना बोर्डों को कानूनी रूप से अधिक मजबूती मिली है।

देवेंद्र टेकाम (जिला पंचायत सदस्य) की अपील: “आदिवासी समाज की संस्कृति, अनूठी परंपराएं और सामाजिक एकता ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। मैं सभी ग्रामीणों से अपील करता हूं कि वे अपनी इस सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों की धरोहर के संरक्षण के लिए हमेशा जागरूक, संगठित और सजग रहें।”

इस फैसले के बाद अब बड़े परली के साथ-साथ आस-पास के अन्य ग्रामीण अंचलों में भी स्थानीय स्वशासन और अवैध धर्मांतरण को रोकने के उपायों पर चर्चा तेज हो गई है।

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