बदायूं । शनिवार, 13 जून 2026
उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का उसहैत थाना क्षेत्र इस समय प्रशासनिक और सामाजिक तनातनी का केंद्र बना हुआ है। सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बजरंग दल जैसे प्रमुख संगठनों के खिलाफ की गई एक कथित अभद्र टिप्पणी ने इलाके का माहौल गरमा दिया है। इस मामले में पुलिस द्वारा की गई तात्कालिक कानूनी कार्रवाई से असंतुष्ट हिंदूवादी संगठनों ने अब सीधे जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) का दरवाजा खटखटाया है, जिसके बाद पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद उसहैत थाना क्षेत्र के वार्ड संख्या-9 से शुरू हुआ। आरोप है कि यहाँ के निवासी तसलीम नामक एक युवक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से आरएसएस और बजरंग दल को निशाना बनाते हुए कुछ बेहद आपत्तिजनक और अभद्र बातें लिखीं। जैसे ही यह पोस्ट स्थानीय स्तर पर वायरल हुई, राष्ट्रीय बजरंग दल और अन्य हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं में आक्रोश फैल गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए संगठनों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता भारी संख्या में उसहैत थाने पहुंचे। कार्यकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने पुलिस को आरोपी के खिलाफ सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज करने के लिए एक लिखित तहरीर (शिकायत पत्र) सौंपी थी।
पुलिस की कार्रवाई और विरोधाभास: जिस पर उठा विवाद
इस मामले में विवाद तब और बढ़ गया जब पुलिस ने आरोपी तसलीम को हिरासत में तो लिया, लेकिन उसके खिलाफ किसी भी गंभीर डिजिटल अपराध (IT Act) या धार्मिक भावनाएं भड़काने की धाराओं (जैसे पूर्ववर्ती IPC या वर्तमान भारतीय न्याय संहिता – BNS की प्रासंगिक धाराएं) के तहत मुकदमा दर्ज नहीं किया।
इसके उलट, उसहैत पुलिस ने आरोपी का केवल शांतिभंग की आशंका (धारा 151/निवारक निरोध) के तहत चालान कर दिया।
हिंदूवादी संगठनों के गंभीर आरोप:
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गुमराह करने का दावा: संगठनों का आरोप है कि शुरुआत में कुछ स्थानीय पुलिस कर्मियों और अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया था कि आरोपी के खिलाफ उचित धाराओं में FIR दर्ज कर ली गई है। लेकिन बाद में पता चला कि कोई मुकदमा दर्ज ही नहीं हुआ, जिससे कार्यकर्ता ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
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हल्की कार्रवाई का विरोध: कार्यकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया पर सरेआम सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करने वाले को सिर्फ शांतिभंग जैसी जमानती धारा में पाबंद करना पुलिस की ढीली कार्यप्रणाली को दर्शाता है।
थाना प्रभारी का स्पष्टीकरण: ‘नहीं मिली कोई तहरीर’
दूसरी तरफ, इस पूरे विवाद पर उसहैत थाना प्रभारी देवेंद्र सिंह का रुख बिल्कुल अलग है। उन्होंने मीडिया को दिए अपने बयान में साफ किया है कि पुलिस को इस मामले में हिंदूवादी संगठनों या किसी अन्य पक्ष से कोई लिखित तहरीर प्राप्त नहीं हुई थी।
थाना प्रभारी के मुताबिक, सोशल मीडिया पर चल रहे विवाद के कारण क्षेत्र में शांति व्यवस्था भंग होने का खतरा मंडरा रहा था। ऐसे में पुलिस ने एहतियातन और त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को हिरासत में लिया और निवारक कानून (Preventive Law) के तहत उसका चालान कोर्ट भेज दिया।
कानूनी दृष्टिकोण
इस मामले को यदि कानून के चश्मे से देखा जाए, तो दोनों पक्षों के बयानों में तकनीकी कमियां नजर आती हैं जिन पर सुधार की जरूरत है:
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तहरीर बनाम सुओ मोटो (Sua Moto) संज्ञान: पुलिस का यह कहना कि ‘तहरीर नहीं मिली इसलिए गंभीर मुकदमा नहीं लिखा’, पूरी तरह न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। यदि सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणी की गई है जिससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है, तो पुलिस के पास खुद संज्ञान लेकर (Suo Moto) भी आईटी एक्ट और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की धाराओं में मामला दर्ज करने का पूरा अधिकार होता है।
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पारदर्शिता की कमी: यदि कार्यकर्ताओं ने तहरीर दी थी, तो थाने के रिसीविंग रजिस्टर या डिजिटल एंट्री में उसकी पारदर्शिता होनी चाहिए। इस ‘कम्युनिकेशन गैप’ के कारण ही जनता का पुलिस पर से विश्वास डगमगाता है।
अब आगे क्या होगा?
चूंकि मामला अब बदायूं के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के संज्ञान में ला दिया गया है, इसलिए प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि संगठनों द्वारा एसएसपी कार्यालय में साक्ष्यों (स्क्रीनशॉट और लिखित शिकायत) के साथ दोबारा तहरीर दी जाती है, तो एसएसपी के आदेश पर उसहैत पुलिस को तसलीम के खिलाफ पूरक मुकदमा (Supplementary FIR) दर्ज कर साइबर सेल से जांच करानी पड़ सकती है।
