शहबाज सरकार और आसिम मुनीर को खुली चुनौती: जानिए क्यों PoK में गोलियां खाने के बाद भी खत्म नहीं हो रहा आंदोलन?

मुजफ्फरराबाद । शनिवार, 13 जून 2026

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK या तथाकथित आज़ाद जम्मू-कश्मीर) का रावलकोट शहर इस समय भारी नागरिक असंतोष और सुरक्षा बलों की दमनकारी कार्रवाई का मुख्य केंद्र बन चुका है। पुंछ जिले की राजधानी रावलकोट के ईदगाह मैदान में हाल ही में जुटी हजारों नागरिकों की शांतिपूर्ण भीड़ पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और रेंजर्स द्वारा की गई फायरिंग के बाद हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। स्थानीय सूत्रों और वैश्विक मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में व्यापक हिंसा हुई है, जिसने पूरे क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को ठप करने पर मजबूर कर दिया है।

आखिर क्यों सुलग रहा है POK?

इस आंदोलन की शुरुआत केवल तात्कालिक गुस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और संवैधानिक कारण हैं।

  1. संसाधनों का विरोधाभास और आर्थिक शोषण: PoK का यह क्षेत्र पूरे पाकिस्तान के लिए 3,000 मेगावाट से अधिक स्वच्छ जलविद्युत (Hydroelectric Power) पैदा करता है, जो पाकिस्तान की कुल जलविद्युत क्षमता का एक-तिहाई है। इसके बावजूद, स्थानीय लोगों को अत्यधिक महंगे बिजली बिल दिए जा रहे हैं और क्षेत्र में सब्सिडी वाले आटे-चावल की भारी किल्लत है।

  2. JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध: इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। पाकिस्तानी प्रशासन ने इस संगठन को “शांति विरोधी” और “अराजकता फैलाने वाला” बताकर इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया और इसके शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, जिससे स्थानीय जनता का गुस्सा और भड़क गया।

  3. 12 शरणार्थी सीटों का संवैधानिक विवाद: आंदोलन का एक बड़ा कारण यह भी है कि PoK की विधानसभा में 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो पाकिस्तान के मुख्य राज्यों (जैसे पंजाब या सिंध) में रहते हैं। JAAC और स्थानीय प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मुख्यधारा की पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टियां इन 12 सीटों का दुरुपयोग कर मुजफ्फरराबाद में अपनी कठपुतली सरकारें बनाती हैं।

प्रदर्शनकारियों का कड़ा रुख और ऐतिहासिक संदर्भ

आंदोलन के प्रमुख आयोजकों में से एक, सरदार अमान खान ने खुले मंच से पाकिस्तानी हुकूमत को चेतावनी देते हुए कहा कि यह धरना अब तब तक खत्म नहीं होगा जब तक कि उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि पाकिस्तानी सेना ने 1956, 1990 और 1992 में भी इसी तरह कश्मीरियों का दमन और कत्लेआम किया था, लेकिन इस बार प्रदर्शनकारी पीछे हटने वाले नहीं हैं।

भारत का कड़ा रुख

भारत सरकार ने इस घटनाक्रम पर बेहद सख्त और स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। नई दिल्ली ने PoK में निहत्थे नागरिकों पर की गई इस कार्रवाई को ‘नरसंहार’ (Massacre) और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन करार दिया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपील की है कि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले इन क्षेत्रों में नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक और जीने के अधिकारों के दमन का कड़ा संज्ञान लें।

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