बलूचिस्तान में ‘ऑपरेशन हेरोफ़ 2.0’ का तांडव: क्या पाकिस्तान के हाथ से निकल रहा है प्रांत?

क्वेटा. जनवरी और फरवरी 2026 के बीच बलूचिस्तान में विद्रोही हिंसा ने अभूतपूर्व और बेहद खतरनाक रूप ले लिया है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा संचालित ‘ऑपरेशन हेरोफ़ 2.0’ को हाल के दशकों का सबसे बड़ा समन्वित विद्रोही हमला माना जा रहा है। इस व्यापक हिंसा के जवाब में पाकिस्तानी सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन रद्द-उल-फ़ितना-1’ शुरू कर दी है।

12 जिलों में एक साथ हमला: सुरक्षा तंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार

31 जनवरी 2026 को BLA ने एक साथ 9 से 12 जिलों में समन्वित हमले शुरू किए, जिससे पूरे प्रांत की सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई।
हमलों के प्रमुख लक्ष्य रहे— क्वेटा, ग्वादर, मस्तुंग, नुश्की, पासनी और खारान

नुश्की में अस्थायी कब्जा

नुश्की शहर के कुछ हिस्सों और प्रशासनिक इमारतों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया और लगभग तीन दिनों तक वहां मौजूद रहे। बाद में सेना ने हेलीकॉप्टरों और ड्रोन की मदद से इलाके को खाली कराया।

मस्तुंग जेल हमला

मस्तुंग में उच्च-सुरक्षा जेल और पुलिस थानों पर हमला कर करीब 30 कैदियों को छुड़ा लिया गया। इसे बलूचिस्तान में सुरक्षा तंत्र की सबसे बड़ी चूक माना जा रहा है।

महिला लड़ाकों की नई रणनीति

BLA द्वारा जारी वीडियो में बड़ी संख्या में महिला लड़ाकों को आत्मघाती और सशस्त्र अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल होते देखा गया। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह विद्रोही रणनीति में बड़ा और चिंताजनक बदलाव है।

जनवरी–फरवरी 2026: मौतों का भयावह आंकड़ा

लगातार हुए हमलों और सैन्य कार्रवाई में भारी जनहानि दर्ज की गई।

श्रेणी अनुमानित संख्या विवरण
विद्रोही 216–242 सेना के अनुसार ऑपरेशन में मारे गए
सुरक्षाकर्मी 22–46 सेना, पुलिस व अर्धसैनिक बल
नागरिक 31–36 गोलीबारी और विस्फोटों में मौत

सेना का जवाब: ‘ऑपरेशन रद्द-उल-फ़ितना-1’

29 जनवरी से शुरू हुआ यह अभियान फरवरी के पहले सप्ताह तक तेज़ रहा।

  • पंजगुर और हरनाई जैसे इलाकों में खुफिया-आधारित ऑपरेशन
  • गनशिप हेलीकॉप्टर और आधुनिक ड्रोन से हवाई हमले
  • 10 फरवरी तक कई क्षेत्रों में टैंक और भारी तोपखाने की तैनाती
    मानवाधिकार संगठनों ने सैन्य दबाव और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

विद्रोह के पीछे की वजहें और असर

  • संसाधनों को लेकर असंतोष: विद्रोही समूहों का आरोप है कि चीन‑पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और खनिज परियोजनाओं का लाभ स्थानीय आबादी तक नहीं पहुंचा।
  • मानवाधिकार संकट: जबरन गायब किए जाने और न्यायेतर हत्याओं के आरोपों ने गुस्से को और बढ़ाया।
  • यातायात व कनेक्टिविटी प्रभावित: क्वेटा से चलने वाली रेल सेवाएं पांच दिनों तक बंद रहीं, कई राष्ट्रीय राजमार्ग सील किए गए।

बलूचिस्तान में जारी हिंसा अब केवल सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और मानवाधिकार संकट का रूप ले चुकी है। जानकारों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ स्थानीय जनता की शिकायतों का समाधान नहीं हुआ, तो यह संघर्ष और गहराने की आशंका है।

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