राहुल गांधी की बढ़ीं कानूनी मुश्किलें: वाराणसी एमपी-एमएलए कोर्ट ने भगवान राम पर टिप्पणी मामले में पलटा निचली अदालत का फैसला

Saransh Kanaujia
6 Min Read

वाराणसी । बुधवार, 10 जून 2026

कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। उत्तर प्रदेश की वाराणसी स्थित विशेष एमपी-एमएलए (MP-MLA) अदालत ने भगवान श्री राम पर कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी के मामले में बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में पूर्व में दिए गए निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई करने को कहा है।

अदालत के इस फैसले के बाद अब यह तय हो गया है कि इस मामले की फाइल दोबारा खुलेगी और निचली अदालत (ACJM कोर्ट) को कानून के दायरे में रहकर इस पर फिर से विचार करना होगा।

क्या था पूरा मामला और राहुल गांधी का बयान?

यह पूरा विवाद पिछले साल यानी 5 मई, 2025 (कुछ दस्तावेजों के अनुसार 21 अप्रैल, 2025) को अमेरिका के बोस्टन में स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी (Brown University) में आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है।

चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने भारत की करुणा, सहिष्णुता और सनातन परंपरा का जिक्र किया था। इसी दौरान उन्होंने भगवान राम का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘पौराणिक व्यक्तित्व’ (Mythological Character) बताया था। उन्होंने कहा था कि भगवान राम दयालु और क्षमाशील थे।

विवाद की वजह:

राहुल गांधी के इसी बयान के बाद भारत में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कई हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने भगवान राम को ‘पौराणिक’ और ‘काल्पनिक’ पात्र बताकर देश के करोड़ों सनातनी भाई-बहनों की आस्था को गहरी चोट पहुंचाई है।

वाराणसी कोर्ट में कानूनी लड़ाई की टाइमलाइन

राहुल गांधी के इस बयान के खिलाफ वाराणसी के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर पांडेय ने अदालत में एक परिवाद (Complaint Case) दाखिल किया था। इस मामले के कानूनी सफर को हम इस तरह समझ सकते हैं:

  • शुरुआती शिकायत: एडवोकेट हरिशंकर पांडेय ने राहुल गांधी के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को आहत करने और ‘नफरती भाषण’ (Hate Speech) के दायरे में मामला चलाने की मांग की।

  • एसीजेएम (ACJM) कोर्ट का पुराना फैसला: शुरुआत में निचली अदालत (ACJM फोर्थ) ने इस केस को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चूंकि बयान विदेशी धरती (अमेरिका) पर दिया गया है, इसलिए इसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार की अग्रिम अनुमति आवश्यक है।

  • रिवीजन कोर्ट का नया रुख: याचिकाकर्ता ने इस फैसले को जिला जज/रिवीजन कोर्ट (एमपी-एमएलए कोर्ट) में चुनौती दी। अब कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती चरण में केस दर्ज करने या संज्ञान लेने के लिए केंद्र की अनुमति अनिवार्य नहीं है।

अदालत की दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां

वाराणसी की रिवीजन अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दो बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु सामने रखे हैं:

  1. केंद्र की अनुमति की अनिवार्यता नहीं: विदेश में दिए गए बयान पर शुरुआती कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी की बाध्यता इस चरण में आड़े नहीं आएगी।

  2. सांसद लोकसेवक नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राहुल गांधी एक निर्वाचित सांसद हैं, वे तकनीकी रूप से ऐसे ‘लोकसेवक’ (Public Servant) नहीं हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा कवच के तहत अग्रिम अनुमति का लाभ मिले।

याचिकाकर्ता हरिशंकर पांडेय का पक्ष:

“राहुल गांधी ने जानबूझकर विदेशी मंच से भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल खड़े किए हैं, जिससे सनातन समाज आहत हुआ है। अब कोर्ट के आदेश के बाद निचली अदालत को इस पर दोबारा फैसला करना होगा।”

स्थिति का विश्लेषण 

सोशल मीडिया और शुरुआती राजनीतिक बयानों में कई बार इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया कि “राहुल गांधी को सजा हो गई है” या “उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हुआ है”।

  • वास्तविकता यह है कि कोर्ट ने अभी केवल इस मामले को ‘सुनवाई के योग्य’ (Maintainable) मानते हुए निचली अदालत को दोबारा गुण-दोष के आधार पर परखने का आदेश दिया है।

  • राहुल गांधी को अभी दोषी नहीं ठहराया गया है। निचली अदालत अब तय करेगी कि क्या उनके बयान से वाकई भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कोई अपराध बनता है या नहीं।

आगे की कानूनी राह

इस आदेश के बाद अब वाराणसी की निचली अदालत जल्द ही इस मामले में अगली तारीख तय करेगी। कोर्ट मामले से जुड़े साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को देखने के बाद यह तय करेगी कि क्या राहुल गांधी को समन (Notice) जारी कर कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा जाए। कांग्रेस की कानूनी टीम भी इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत (हाईकोर्ट) का रुख कर सकती है।

Related Post

Share This Article