डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुआ व्यापार समझौता, चीन सुचारू रखेगा रेयर अर्थ की सप्लाई

नई दिल्‍ली. दक्षिण कोरिया के बुसान में चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बहुप्रतीक्षित मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच व्‍यापार समझौता हो गया है. अमेरिका ने तत्‍काल प्रभाव से चीन पर से 10 फीसदी टैरिफ हटा दिया है. अब टैरिफ 57 फीसदी से घटकर 47 फीसदी हो गया है. इस समझौते के बाद जहां अमेरिका ने टैरिफ घटाया है, वहीं चीन ने अमेरिका से सोयाबीन खरीदने और रेयर अर्थ की सप्‍लाई सुचारू करने का भरोसा दिया है. इनके अलावा भी दोनों देशों के बीच कई विषयों पर सहमति बनी है,जिसकी अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. चीन और अमेरिका के बीच हुआ यह व्यापार समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत की खबर है. भारत पर इस डील के मिश्रित प्रभाव पड़ने की संभावना है.
कुल मिलाकर अमेरिका-चीन व्यापार समझौता भारत के लिए राहत और चुनौती दोनों लेकर आया है. एक तरफ इससे वैश्विक स्थिरता बढ़ेगी और निवेश का माहौल सुधरेगा, दूसरी तरफ भारत की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कुछ क्षेत्रों में अवसर सीमित हो सकते हैं. आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह डील कितनी गहराई तक जाती है और उसके वास्तविक आर्थिक परिणाम क्या निकलते हैं.

वैश्विक ट्रेड टेंशन कम होने का मिलेगा फायदा

इस समझौते से वैश्विक आर्थिक माहौल में स्थिरता आने की उम्मीद है. पिछले कुछ समय से अमेरिका-चीन ट्रेड वार ने विश्व व्यापार को अस्थिर बना दिया था. अब जब दोनों महाशक्तियां आपसी तनाव को कम करने की दिशा में बढ़ रही हैं, तो वैश्विक बाजारों में भरोसा लौटेगा. भारत जैसे उभरते बाजारों को इसका अप्रत्यक्ष फायदा मिल सकता है. विदेशी निवेशक अब स्थिर माहौल में निवेश बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं. इससे भारत में एफडीआई और एफपीआई दोनों का प्रवाह बढ़ने की संभावना है, जो भारतीय रुपये और शेयर बाजार दोनों के लिए फायदेमंद होगा.

मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर पर नकारात्‍मक असर

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर की कंपनियां “चीन प्लस वन” रणनीति पर काम कर रही थीं, यानी चीन के साथ किसी और देश में भी उत्पादन केंद्र विकसित करना. भारत इस रणनीति का बड़ा लाभार्थी बनने की उम्मीद कर रहा था. लेकिन अगर अमेरिका और चीन के बीच संबंध सुधरते हैं, तो कंपनियां चीन से बाहर निकलने की प्रक्रिया को रोक सकती हैं.
अमेरिका और चीन के बीच जब टैरिफ युद्ध चल रहा था, तब कई अमेरिकी कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन चीन से हटाकर भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों की ओर मोड़ ली थी. इसका फायदा भारत को खूब मिला. अब चीन-अमेरिका में अगर व्‍यापार सामान्‍य होता है तो ऐपल जैसी कंपनियां अपना फोकस वापस चीन की पर कर सकती हैं. इससे भारत के “मेक इन इंडिया” मिशन को झटका लग सकता है. भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और ऑटो पार्ट्स सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है.

कृषि निर्यात पर असर

भारत के कृषि निर्यात पर भी असर देखने को मिल सकता है. समझौते के तहत चीन अब अमेरिका से बड़ी मात्रा में सोयाबीन और अन्य कृषि उत्पाद खरीदेगा. इसका मतलब यह है कि भारत के लिए चीन के बाजार में अपनी कृषि वस्तुएं बेचने की संभावनाएं घट सकती हैं. भारत पहले से ही चीन को सीमित मात्रा में कृषि उत्पाद निर्यात करता है. हाल के दिनों में कृषि निर्यात ने जोर पकड़ा था, लेकिन अगर अमेरिकी कृषि उत्‍पादों को चीन में सहज पहुंच मिलती है तो यह भारत के लिए चिंता की बात होगी.
साभार : न्यूज18

‘गांधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ पुस्तक के बारे में जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

https://matribhumisamachar.com/2025/12/10/86283/

आप इस ई-बुक को पढ़ने के लिए निम्न लिंक पर भी क्लिक कर सकते हैं:

https://www.amazon.in/dp/B0FTMKHGV6

यह भी पढ़ें : 1857 का स्वातंत्र्य समर : कारण से परिणाम तक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *