महावीर चक्र से सम्मानित कैप्टन चंद्र नारायण सिंह के परिवार ने गढ़वाल राइफल्स को वीरता पदक प्रदान किए

गढ़वाल राइफल्स की द्वितीय बटालियन के वीर अधिकारी कैप्टन चंद्र नारायण सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत) की 60वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आज धर्मशाला में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया, कैप्टन ने 1965 के भारत- पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस वीर योद्धा के परिवार ने उनकी चिरस्थायी विरासत को श्रद्धांजलि स्वरूप गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट को उनके शौर्य और अन्य सेवा पदक प्रदान किए।

एक भावुक क्षण में, दिवंगत अधिकारी के भाई श्री सुखदेव सिंह ने रेजिमेंट को महावीर चक्र (एमवीसी) और अन्य सेवा पदक प्रदान किए। गढ़वाल राइफल्स और गढ़वाल स्काउट्स के कर्नल और अंडमान एवं निकोबार कमांड (सीआईएनसीएएन) के कमांडर- इन- चीफ लेफ्टिनेंट जनरल डी. एस. राणा ने रेजिमेंट की ओर से यह पदक ग्रहण किए। इस समारोह में रेजिमेंट के पूर्व सैनिकों और सेवारत सैन्यकर्मियों के साथ- साथ अन्य सैन्य कर्मियों ने भी भाग लिया।

अपने संबोधन में, लेफ्टिनेंट जनरल डी. एस. राणा ने कैप्टन चंद्र नारायण सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें वीरता, नेतृत्व और देशभक्ति का सच्चा प्रतीक बताया। उन्होंने रेजिमेंट को पदक प्रदान करने के लिए उनके परिवार के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया और कहा कि इस अधिकारी की विरासत भारतीय सैनिकों की भावी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

कैप्टन चंद्र नारायण सिंह को 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनकी असाधारण बहादुरी और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 7 जुलाई 1939 को शिकारपुर, गढ़वाल (उत्तर प्रदेश) में जन्मे, कैप्टन चंद्र नारायण सिंह मुख्यालय 120 इन्फैंट्री ब्रिगेड से जुड़े थे, जब 5 अगस्त 1965 को ब्रिगेड के जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में 100 से अधिक दुश्मन घुसपैठियों की रिपोर्ट सामने आई। खतरे की पुष्टि करने के लिए, उन्होंने 4000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र में एक गश्ती दल का नेतृत्व किया। क्षेत्र में तलाश अभियान चलाते  समय, उनकी टीम दुश्मन की भारी गोलीबारी और ग्रेनेड हमलों की चपेट में आ गई। संख्या में कम होने के बावजूद निडर टीम ने रात में हमला शुरू करने का फैसला किया, इस दौरान उनकी छोटी टीम ने छह दुश्मन सैनिकों को बेअसर कर दिया और कई अन्य को घायल कर दिया। जवाबी हमले के दौरान दुश्मन की गोली सिर में लगने से घायल होने के बाद भी कैप्टन सिंह ने नेतृत्व जारी रखा और सेना को पीछे करने से इनकार कर दिया, अंततः कर्तव्य पथ पर चलते हुए उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

अपने अद्वितीय साहस, वीरता और मिशन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के लिए, कैप्टन चंद्र नारायण सिंह को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

वीर जवानों के परिजनों द्वारा प्रदान किए गए पदकों को उत्तराखंड के लैंसडाउन स्थित गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर संग्रहालय में संरक्षित और प्रदर्शित किया जाएगा। ये पदक कैप्टन सिंह की वीरता के प्रति एक अमिट श्रद्धांजलि और भारतीय सेना के जवानों की निस्वार्थ सेवा की याद दिलाएंगे। शहीदों के परिवारों द्वारा किए गए ऐसे नेक कार्यों का बहुत अधिक महत्व है, क्योंकि ये सुनिश्चित करते हैं कि सर्वोच्च बलिदान की विरासत राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में अंकित रहे।

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