अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा को पूरी तरह साफ करने की कही बात

वाशिंगटन. बस कुछ हफ्ते पहले की ही बात है—अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा को ‘ध्वस्त करने की जगह’ करार दिया और उसे पूरी तरह ‘साफ’ करने की बात कह डाली. उस वक्त तक लगा कि ये बस ट्रंप का वही पुराना बेबाक अंदाज है, जो अक्सर सुर्खियों में रहता है. लेकिन अब तस्वीर साफ हो रही है. इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अमेरिका दौरे के दौरान ओवल ऑफिस में हुई बातचीत और फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बातें सामने आईं, उन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया. ट्रंप ने अब खुलकर कह दिया है—अमेरिका गाजा पर कब्जा करने के लिए तैयार है.याद रखिए, ये वही ट्रंप हैं जिन्होंने ग्रीनलैंड खरीदने की मंशा जाहिर की थी, पनामा और कनाडा को अमेरिका का हिस्सा बनाने की बातें कही थीं. अब सवाल उठता है—क्या गाजा को लेकर उनकी ये योजना महज़ एक और विवादित बयान है, या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है?

ट्रंप ने क्या-क्या कहा?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ताजा बयान में कहा है कि फिलिस्तीनी गाजा में इसलिए लौटना चाहते हैं क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं है. उन्होंने गाजा की मौजूदा हालत को “तबाही का मंजर” बताया, जहां लगभग हर इमारत खंडहर में तब्दील हो चुकी है. ट्रंप ने सुझाव दिया कि फिलिस्तीनियों को किसी दूसरी जगह बसाकर उन्हें शांति से जीवन जीने का मौका देना चाहिए. उन्होंने यह भी ऐलान किया कि अमेरिका गाजा का नियंत्रण अपने हाथ में लेगा, वहां पड़े बिना फटे बमों को डिफ्यूज करेगा, पुनर्निर्माण करेगा और हजारों नौकरियां पैदा करेगा. उनके मुताबिक, यह ऐसा बदलाव होगा जिस पर पूरे मध्य पूर्व को गर्व होगा. हालांकि, ट्रंप के इस बयान को कई लोग फिलिस्तीनियों को गाजा से बाहर करने की मंशा के रूप में देख रहे हैं. इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जॉर्डन, मिस्र और अन्य अरब देशों से अपील की कि वे फिलिस्तीनियों को अपने यहां बसाने के लिए आगे आएं. मगर इन देशों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है.

गाजा पर कब्जे की रणनीति क्या है?

ट्रंप पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी को मजबूत रखना चाहते हैं, ताकि ईरान और अन्य विरोधी ताकतों पर नज़र रखी जा सके. इज़रायल के कट्टर समर्थक रहे ट्रंप की कोशिश यही होगी कि इस क्षेत्र में इज़रायल को कूटनीतिक मान्यता दिलाने में अमेरिका की भूमिका और मजबूत हो. अगर अमेरिकी सेना यहां बनी रहती है, तो इससे इस मकसद को और बल मिलेगा. मध्य पूर्व ऊर्जा संसाधनों का केंद्र है. गाजा पट्टी में भले ही बड़े तेल भंडार न हों, लेकिन इस क्षेत्र में स्थिरता से अमेरिका को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा होता है. खासकर ईरान, रूस और चीन को कमजोर करने के लिहाज से यह अहम साबित हो सकता है.

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के हालिया बयान का सबसे अजीब पहलू यह था कि उन्होंने गाजा के पुनर्निर्माण की कल्पना एक ऐसे पर्यटन और व्यापार केंद्र के रूप में की, जिसे वह “मिडिल ईस्ट की रिवेरा” बनने की संभावना बताते हैं. ट्रंप पहले एक रियल एस्टेट डेवलपर रह चुके हैं. और यही अक्सर उनकी भू-राजनीतिक सोच को प्रभावित करती रही है. वे जटिल कूटनीतिक चुनौतियों को भी प्रॉपर्टी डील और आर्थिक विकास के नजरिए से देखते हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि उनकी यह दृष्टि गाजा की गहरी राजनीतिक, ऐतिहासिक और सुरक्षा संबंधी हकीकतों को पूरी तरह नजरअंदाज करती है.

अमेरिकी सैनिकों का इस्तेमाल

इज़रायल के कट्टर दक्षिणपंथी गुट लंबे समय से फिलिस्तीनियों को हमेशा के लिए कहीं और बसाने की वकालत करते रहे हैं. उधर, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साफ कहा था कि वे गाजा से फिलिस्तीनियों को हटाने के खिलाफ हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब डोनाल्ड ट्रंप से पूछा गया कि क्या वे अपने इस प्लान को अमल में लाने के लिए अमेरिकी सेना का सहारा लेंगे, तो उन्होंने जवाब दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेंगे. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका किस कानूनी आधार पर गाजा में ऐसा कदम उठा सकता है.

क्या ट्रंप की योजना लागू हो सकती है?

इसका सीधा जवाब है- नहीं. अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी आबादी को जबरन विस्थापित करने पर सख्त पाबंदी लगाता है. गाजा पहले से ही उन फिलिस्तीनियों का घर रहा है, जो इज़रायल के निर्माण के दौरान हुए युद्धों में बेघर हो गए थे या जबरन हटा दिए गए थे. डोनाल्ड ट्रंप की योजना अगर लागू होती है, तो इसका मतलब होगा कि इन फिलिस्तीनियों को अरब दुनिया या उससे भी दूर कहीं और भेज दिया जाएगा. यह योजना न सिर्फ ”टू स्टेट सॉल्यूशन” की संभावना को पूरी तरह खत्म कर देगी, बल्कि इसे अरब जगत और फिलिस्तीनियों की ‘निर्वासन योजना’ या ‘जातीय सफाए’ के रूप में देखा जाएगा. यही वजह है कि अरब देशों ने इस विचार को सिरे से खारिज कर दिया है.

अरब लीग ने की आलोचना

शनिवार को मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, फिलिस्तीनी अथॉरिटी और अरब लीग ने संयुक्त बयान जारी कर इस योजना की आलोचना की. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने ऐसा कोई कदम उठाया, तो यह पूरे क्षेत्र की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है, संघर्ष को और बढ़ा सकता है. हालांकि, जेनेवा कन्वेंशन के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में जनसंख्या को स्थानांतरित करने की अनुमति दी जा सकती है, जैसे—अगर नागरिकों की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो या सैन्य कारणों से ऐसा करना जरूरी हो. इसके अलावा, युद्धबंदियों को युद्धक्षेत्र से दूर ले जाकर हिरासत केंद्रों में रखा जा सकता है, लेकिन यह केवल सुरक्षा या सैन्य जरूरतों के आधार पर ही हो सकता है.

साभार : टीवी9 भारतवर्ष

भारत : 1885 से 1950 (इतिहास पर एक दृष्टि) व/या भारत : 1857 से 1957 (इतिहास पर एक दृष्टि) पुस्तक अपने घर/कार्यालय पर मंगाने के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं

सारांश कनौजिया की पुस्तकें 

ऑडियो बुक : भारत 1885 से 1950 (इतिहास पर एक दृष्टि)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *