राजसमंद की अनूठी पहल: अब मंदिरों के ‘प्रसाद’ से महकेंगे खेत, ₹5 किलो में मिलेगी ऑर्गेनिक खाद

जयपुर | शनिवार, 11 अप्रैल 2026

राजस्थान के राजसमंद जिले ने पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक आस्था के सम्मान की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। प्रदेश में पहली बार मंदिरों में चढ़ाए गए “निर्माल्य” (फूल और मालाओं) से जैविक खाद बनाने का प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक धरातल पर उतर चुका है। नगर पालिका की इस पहल को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (कचरे से कंचन) मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है, जो न केवल प्रदूषण कम करेगा बल्कि स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होगा।

🎯 मिशन 2026: कैसे खाद बन रही है ‘संजीवनी’?

नगर पालिका प्रशासन ने इस योजना को पूरी तरह से सुव्यवस्थित कर दिया है। वर्तमान में इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जा रही है:

  • डोर-टू-टेंपल कलेक्शन: विशेष रूप से डिजाइन किए गए “स्वच्छता वाहन” प्रतिदिन सुबह शहर के प्रमुख मंदिरों से फूलों को एकत्रित करते हैं।

  • प्रोसेसिंग सेंटर: गुंजोल स्थित डंपिंग यार्ड में एक आधुनिक प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की गई है, जहाँ वैज्ञानिक पद्धति से फूलों को कंपोस्ट में बदला जाता है।

  • डिजिटल मॉनिटरिंग: पुजारियों और सेवाकर्मियों के साथ समन्वय के लिए रियल-टाइम व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं, ताकि फूलों का उठाव समय पर सुनिश्चित हो सके।

प्रमुख आंकड़े एक नज़र में:

लक्ष्य/विवरण वर्तमान स्थिति
दैनिक फूल संग्रह 200 से 500 किलोग्राम
जुड़े हुए मंदिर प्रथम चरण में 20 प्रमुख मंदिर
खाद की कीमत मात्र ₹5 प्रति किलोग्राम
अनुमानित आय ₹30,000 प्रतिमाह (नगर पालिका हेतु)

🚫 जल प्रदूषण पर लगा ‘पूर्ण विराम’

राजसमंद और प्रसिद्ध धार्मिक नगरी नाथद्वारा में यह समस्या आम थी कि श्रद्धालु फूलों को पॉलिथीन में बांधकर कुओं, बावड़ियों या झीलों में प्रवाहित कर देते थे। इससे जल स्रोत दूषित हो रहे थे और जलीय जीवन पर संकट मंडरा रहा था।

नगर पालिका आयुक्त सौरभ कुमार जिंदल के अनुसार, “यह पहल केवल सफाई तक सीमित नहीं है। अब तक जो फूल जल प्रदूषण का कारण बनते थे, वे अब खेतों में उर्वरक शक्ति बढ़ाएंगे। इससे हम अपनी प्राचीन जल विरासतों को बचाने में सफल हो रहे हैं।”

🌱 किसानों के लिए वरदान: मात्र ₹5 में जैविक पोषण

बाजार में मिलने वाली महंगी रासायनिक खादों के बीच, ₹5 किलो की यह ऑर्गेनिक खाद स्थानीय किसानों के लिए किसी “संजीवनी” से कम नहीं है।

  • मिट्टी की सेहत: यह खाद मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाती है।

  • केमिकल फ्री खेती: राजस्थान सरकार के जैविक राज्य बनाने के लक्ष्य को इससे बल मिल रहा है।

  • किफायती विकल्प: छोटे किसानों के लिए खाद की लागत 70% तक कम हो गई है।

💡 क्यों खास है यह राजसमंद मॉडल?

यह योजना आने वाले समय में अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसे बड़े धार्मिक केंद्रों के लिए एक रोल मॉडल बन सकती है। यह सिद्ध करता है कि यदि तकनीक और आस्था को मिला दिया जाए, तो पर्यावरण की बड़ी से बड़ी चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है।

विशेष नोट: राजसमंद की इस पहल को देखते हुए प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसे लागू करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

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