मालदा हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट का रौद्र रूप: मुख्य सचिव और DGP तलब, बंगाल में केंद्रीय बल तैनात

कोलकाता । 02 अप्रैल, 2026

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) कार्य में लगे सात न्यायिक अधिकारियों (जिनमें तीन महिला अधिकारी शामिल थीं) को भीड़ द्वारा बंधक बनाए जाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली पीठ ने इसे न्यायपालिका पर “सोचा-समझा और मनोवैज्ञानिक हमला” करार दिया है।

1. सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “यह आपराधिक अवमानना है”

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारियों को घंटों तक बिना भोजन, पानी और सुरक्षा के छोड़ देना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि न्याय व्यवस्था को डराने की कोशिश है। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • यह घटना न्यायिक अधिकारियों के मनोबल को गिराने और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने की एक सोची-समझी साजिश लगती है।

  • राज्य प्रशासन का रवैया “अत्यंत निराशाजनक” रहा। रात 8:30 बजे तक वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाया, जो ड्यूटी से भागने जैसा है।

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2. शीर्ष अधिकारियों पर गिरी गाज

अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary), गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) के साथ-साथ मालदा के जिला मजिस्ट्रेट (DM) और SSP को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया है।

  • इन सभी अधिकारियों को 6 अप्रैल, 2026 को शाम 4 बजे वर्चुअल माध्यम से कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया है।

  • कोर्ट ने पूछा है कि उनके खिलाफ ड्यूटी में लापरवाही और अदालत के आदेशों की अवहेलना के लिए कार्रवाई क्यों न की जाए।

3. केंद्रीय बलों (Central Forces) की तैनाती का आदेश

राज्य पुलिस पर अविश्वास जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को तुरंत निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:

  • जहाँ भी न्यायिक अधिकारी SIR (Special Intensive Revision) का कार्य कर रहे हैं, वहां तुरंत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती की जाए।

  • सुनवाई कक्ष के भीतर भीड़ को नियंत्रित किया जाए (एक समय में केवल 3-5 लोगों को प्रवेश की अनुमति)।

  • यदि किसी अधिकारी को अपने परिवार की सुरक्षा का डर है, तो तुरंत उसका आकलन कर सुरक्षा मुहैया कराई जाए।

4. CBI या NIA जांच की संभावना

कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस पूरी घटना की जांच CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने पर विचार करने को कहा है। पीठ ने कहा कि यह कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उन लोगों द्वारा किया गया हमला था जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।

क्या था मालदा का मामला?

मालदा के कालियाचक 2 ब्लॉक में मतदाता सूची में नाम कटने को लेकर लोग विरोध कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने उस परिसर को घेर लिया जहाँ न्यायिक अधिकारी दावों और आपत्तियों की सुनवाई कर रहे थे। अधिकारियों के वाहनों में तोड़फोड़ की गई और उन्हें घंटों तक बंधक बनाकर रखा गया। आरोप है कि स्थानीय पुलिस मूकदर्शक बनी रही और वरिष्ठ अधिकारियों ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया।

न्यूज़ इन ब्रीफ (Quick Highlights):

  • दोषी: भीड़ और निष्क्रिय राज्य प्रशासन।

  • कोर्ट का रुख: “बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त।”

  • अगली सुनवाई: 6 अप्रैल, 2026 (अधिकारियों की पेशी)।

  • सुरक्षा: अब राज्य पुलिस के बजाय केंद्रीय बल करेंगे जजों की सुरक्षा।

निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने साफ कर दिया है कि न्यायिक कार्यों में किसी भी तरह का राजनीतिक या हिंसक हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह मामला अब बंगाल सरकार और न्यायपालिका के बीच एक बड़े कानूनी टकराव में तब्दील हो गया है।

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