कानपुर में तैयार हुआ ‘मिनी फॉरेस्ट’: मियावाकी तकनीक से 1 हेक्टेयर में लगे 35,000 पौधे, अब प्रदूषण से मिलेगी राहत

कानपुर। औद्योगिक धुएं और कंक्रीट के जंगलों के बीच सांस ले रहे कानपुर के लिए एक राहत भरी खबर है। शहर के बीचों-बीच वन विभाग कार्यालय के पास खाली पड़ी एक हेक्टेयर बंजर जमीन अब ‘हरियाली की चादर’ ओढ़ चुकी है। उत्तर प्रदेश वन विभाग ने जापानी ‘मियावाकी तकनीक’ का इस्तेमाल कर यहाँ एक शानदार इको पार्क विकसित किया है, जो आने वाले समय में शहर के बढ़ते तापमान और प्रदूषण (AQI) को नियंत्रित करने में ‘गेम-चेंजर’ साबित होगा।

35 हजार पौधों का सुरक्षा कवच

डीएफओ दिव्या के अनुसार, महज एक हेक्टेयर के छोटे से क्षेत्र में करीब 35,000 पौधे लगाए गए हैं। मियावाकी पद्धति की खासियत यह है कि इसमें पौधे सामान्य से 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और जंगल 30 गुना ज्यादा घना होता है। यह घनापन न केवल जहरीली गैसों को सोखने के लिए ‘कार्बन सिंक’ का काम करेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर ‘माइक्रो क्लाइमेट’ बनाकर गर्मी से भी निजात दिलाएगा।

स्वदेशी प्रजातियों पर जोर: ‘त्रिवेणी वाटिका’ बनी मुख्य केंद्र

पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखते हुए पार्क में विदेशी पौधों के बजाय स्थानीय और अधिक ऑक्सीजन देने वाली प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है।

  • मुख्य वृक्ष: बरगद, पीपल, पाकड़ और चितवन।

  • खास आकर्षण: ‘त्रिवेणी वाटिका’, जहाँ बरगद-पीपल-पाकड़ का संगम है।

  • अन्य: विभिन्न प्रकार की औषधीय हर्ब और झाड़ियाँ।

जनता के लिए सौगात: बजट ₹20 लाख, एंट्री फ्री

जुलाई से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट पर करीब 15 से 20 लाख रुपए का खर्च आया है, जिसमें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और फेंसिंग जैसे काम शामिल हैं। पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विभाग ने इस पार्क में प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क रखा है।

विशेषज्ञों की राय: AQI में आएगा सुधार

प्रदूषण की मार झेल रहे कानपुरवासियों के लिए यह ‘मिनी फॉरेस्ट’ एक संजीवनी की तरह है। घने पौधों का यह समूह एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करेगा, जिससे आसपास के इलाकों की वायु गुणवत्ता में सुधार होने की पूरी उम्मीद है।

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