जम्मू । शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक ऐतिहासिक और बड़े कानूनी कदम के तहत वर्ष 1996 के श्रीनगर हिंसा मामले में अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के छह वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ जम्मू स्थित विशेष एनआईए अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है। इस मामले में जांच एजेंसी ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इन नेताओं ने एक मारे गए आतंकवादी के जनाजे के दौरान जानबूझकर भीड़ को उकसाया, जिसके कारण पुलिस और सुरक्षा बलों पर जानलेवा हमला हुआ और घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की।
इस लेख में हम इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि, आरोपियों की स्थिति, लगाई गई कानूनी धाराओं और एनआईए की इस बड़ी कार्रवाई के बारे में विस्तार से समझेंगे।
1996 श्रीनगर नाज़ क्रॉसिंग हिंसा का पूरा मामला क्या है?
एनआईए (NIA) की चार्जशीट के अनुसार, यह मामला 17 जुलाई 1996 का है। श्रीनगर के नाज़ क्रॉसिंग (Naz Crossing) इलाके में मारे गए प्रतिबंधित आतंकी संगठन के कमांडर हिलाल अहमद बेग के जनाजे के दौरान हुर्रियत के इन छह नेताओं ने एक गैरकानूनी भीड़ का नेतृत्व किया था।
जांच में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जनाजे के उस जुलूस में केवल आम नागरिक या समर्थक ही नहीं, बल्कि भारी हथियारों से लैस सक्रिय आतंकवादी भी शामिल थे। नेताओं द्वारा भीड़ को उकसाए जाने के बाद, जुलूस में शामिल आतंकियों ने वहां तैनात पुलिसकर्मियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हिंसक हमले में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और भीड़ द्वारा किए गए भारी पथराव के कारण सरकारी वाहनों व संपत्ति को भी काफी नुकसान पहुंचा था।
किन हुर्रियत नेताओं के खिलाफ दाखिल हुई है चार्जशीट?
एनआईए ने शुक्रवार को जम्मू की विशेष अदालत में जिन छह अलगाववादी नेताओं के खिलाफ चार्जशीट पेश की है, उनके नाम निम्नलिखित हैं:
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शब्बीर अहमद शाह (Shabir Ahmad Shah)
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सैयद अली शाह गिलानी (Syed Ali Shah Geelani) – (दिवंगत)
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अब्दुल गनी लोन (Abdul Gani Lone) – (दिवंगत)
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मोहम्मद याकूब वकील (Mohammad Yaqoob Wakil) – (दिवंगत)
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जावेद अहमद मीर (Javed Ahmad Mir)
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शकील अहमद बख्शी (Shakeel Ahmad Bakshi)
कानूनी स्थिति (Abated Proceedings): गौर करने वाली बात यह है कि इस सूची में शामिल सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील का पिछले वर्षों के दौरान निधन हो चुका है। कानून के मुताबिक, आरोपी की मृत्यु होने पर उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही समाप्त (Abate) हो जाती है। हालांकि, एनआईए ने अदालत को स्पष्ट किया है कि भले ही ये तीन नेता अब जीवित नहीं हैं, लेकिन जांच के दौरान इस बात के पुख्ता और पर्याप्त सबूत मिले हैं कि वे इस पूरी आपराधिक साजिश और गैरकानूनी जमावड़े में मुख्य रूप से शामिल थे।
नेताओं पर कौन सी कानूनी धाराएं लगाई गई हैं?
सुरक्षा बलों और देश के खिलाफ इस हिंसक साजिश को रचने के आरोप में एनआईए ने आरोपियों पर बेहद सख्त कानूनी धाराएं लगाई हैं:
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रणबीर दंड संहिता (RPC), 1989: चूंकि यह मामला साल 1996 (जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने से पहले) का है, इसलिए इस पर तत्कालीन रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) की धाराएं लागू की गई हैं। इनमें आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy), हत्या का प्रयास (Attempt to Murder), दंगा भड़काना (Rioting) और ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के संगीन आरोप शामिल हैं।
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यूएपीए (UAPA), 1967: इसके अलावा, देश की संप्रभुता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों के चलते गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है।
एनआईए की जांच में क्या बड़े खुलासे हुए?
एनआईए की तफ्तीश में यह बात सामने आई है कि यह हिंसा कोई अचानक भड़का हुआ गुस्सा नहीं थी, बल्कि एक पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश का हिस्सा थी।
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आतंकी एजेंडे के लिए जनाजे का इस्तेमाल: नेताओं का मुख्य उद्देश्य एक मारे गए आतंकी के जनाजे को ढाल बनाकर अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देना था।
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भड़काऊ भाषण और राष्ट्र विरोधी नारेबाजी: इन नेताओं ने सक्रिय रूप से भीड़ के सामने भड़काऊ भाषण दिए, जिसमें भारत सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष (Armed Struggle) का खुलकर समर्थन किया गया। साथ ही मौके पर भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगवाए गए।
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शक्ति प्रदर्शन: इस पूरी हिंसा और बड़े प्रदर्शन का एक उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों और कानून-व्यवस्था को सीधी चुनौती देकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दबदबे और ताकत का प्रदर्शन करना भी था।
स्थानीय पुलिस से एनआईए तक कैसे पहुंचा केस?
इस हिंसक घटना के तुरंत बाद, 17 जुलाई 1996 को ही श्रीनगर के शेरगढ़ी पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी। सालों तक यह मामला स्थानीय फाइलों में दबा रहा। इसके बाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के कड़े निर्देशों पर संज्ञान लेते हुए अप्रैल 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आधिकारिक तौर पर इस पुराने मामले की जांच पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली।
एनआईए ने साफ किया है कि विशेष अदालत में पहली चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी इस मामले की गहन जांच लगातार जारी है। जैसे-जैसे नए डिजिटल या भौतिक साक्ष्य सामने आएंगे, अन्य सहयोगियों के खिलाफ भी पूरक चार्जशीट (Supplementary Charge Sheet) के माध्यम से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. एनआईए ने हुर्रियत नेताओं के खिलाफ किस मामले में चार्जशीट दाखिल की है?
एनआईए ने 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर के नाज़ क्रॉसिंग पर मारे गए आतंकी हिलाल अहमद बेग के जनाजे के दौरान पुलिस पर हमला कराने, भीड़ को उकसाने और भारत विरोधी हिंसा भड़काने के मामले में चार्जशीट दाखिल की है।
2. चार्जशीट में नामजद कौन से नेताओं का निधन हो चुका है?
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के तीन प्रमुख नेताओं—सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील का निधन हो चुका है, जिसके कारण उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही अब तकनीकी रूप से समाप्त (Abated) हो गई है।
3. इस मामले में आरपीसी (RPC) की धाराएं क्यों लगाई गई हैं, आईपीसी क्यों नहीं?
चूंकि यह हिंसक घटना साल 1996 में जम्मू-कश्मीर में हुई थी, और उस समय वहां भारतीय दंड संहिता (IPC) के स्थान पर रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू थी, इसलिए कानूनी नियमानुसार तत्कालीन आरपीसी और यूएपीए (UAPA) की धाराओं के तहत ही कार्रवाई की गई है।
4. एनआईए ने इस मामले की जांच कब शुरू की थी?
श्रीनगर के शेरगढ़ी थाने में 1996 में दर्ज हुई एफआईआर के बाद, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अप्रैल 2026 में इस केस की कमान संभाली और त्वरित जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की।
Disclaimer (अस्वीकरण): यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। लेख में दी गई जानकारियां एनआईए (NIA) द्वारा विशेष अदालत में दाखिल की गई चार्जशीट के आधिकारिक विवरण और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। कानूनी मामलों की किसी भी व्याख्या के लिए अदालत के आधिकारिक दस्तावेजों को ही अंतिम माना जाना चाहिए।
