तेहरान । गुरुवार, 25 जून 2026
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच ईरान ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। ईरान के केंद्रीय बैंक (CBI) के गवर्नर अब्दोलनासर हेम्माती (Abdolnaser Hemmati) ने घोषणा की है कि उनका देश अब अपने तेल निर्यात के बदले किसी भी करेंसी में भुगतान स्वीकार करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान का यह कदम अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को खत्म करने और वैश्विक व्यापार में विविधता लाने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक ‘एमओयू’ (MoU) और सकारात्मक वार्ता की खबरें आई हैं। स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक (Burgenstock) में दोनों देशों के बीच हुई वार्ता के बाद अमेरिका ने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंधों में ढील देने (वैध रूप से 21 अगस्त 2026 तक) और लगभग फ्रीज की गई 12 अरब डॉलर की ईरानी संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मुक्त करने पर सहमति जताई है।
ईरान के इस ऐतिहासिक और रणनीतिक फैसले का भारत पर भी गहरा और सकारात्मक असर दिखाई दे सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस बदलते वैश्विक परिदृश्य के भारत के लिए क्या मायने हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ईरान का यह फैसला?
भारत कभी ईरानी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक था। डेटा इंटेलिजेंस फर्म केपलर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण व्यापार ठप होने से पहले अपने चरम पर भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी लगभग 11.5% थी। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता होने के नाते भारत ने तत्कालीन अमेरिकी दबाव के बाद ईरान से खरीदारी बंद कर दी थी।
अब प्रतिबंधों में ढील और वैकल्पिक मुद्राओं में भुगतान की छूट से भारतीय रिफाइनर्स के लिए नए रास्ते खुल गए हैं। इसके दो मुख्य आर्थिक फायदे हैं:
1. परिवहन लागत और समय में भारी बचत
खाड़ी देशों से भारत की भौगोलिक निकटता के कारण तेल परिवहन का समय और माल ढुलाई की लागत (Freight Cost) काफी कम हो जाती है। अन्य दूरदराज के देशों की तुलना में ईरान से तेल लाना बेहद किफायती और त्वरित है।
2. भुगतान के लिए 60 से 90 दिनों की लंबी मोहलत (Credit Period)
ईरान ऐतिहासिक रूप से भारतीय रिफाइनर्स को तेल भुगतान के लिए 60 से 90 दिनों की लंबी मोहलत देता रहा है। इसके विपरीत, अन्य वैश्विक तेल आपूर्तिकर्ता आमतौर पर केवल 30 दिनों का समय देते हैं। यह अतिरिक्त समय भारतीय कंपनियों के वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो सकता है।
मल्टी-करेंसी मॉडल और भारत का पुराना अनुभव
ईरान का गैर-डॉलर व्यापार पर जोर देना उस वैश्विक बदलाव (De-dollarization) को दर्शाता है, जिसमें भारत पहले से ही अग्रणी भूमिका निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच रूस से तेल खरीदने के लिए भारत ने पहले ही एक सफल मल्टी-करेंसी मॉडल अपनाया हुआ है।
भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर के अलावा भारतीय रुपया (INR), यूएई दिरहम (AED), चीनी युआन (CNY) और कुछ मामलों में रूसी रूबल (RUB) का इस्तेमाल किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी रोसनेफ्ट से रूसी तेल खरीदने के लिए रूबल आधारित दीर्घकालिक समझौता किया था। अब यही मॉडल ईरान के साथ भी लागू किया जा सकता है, जिससे ‘रुपया-रियाल’ व्यापार या दिरहम के जरिए लेन-देन को आसान बनाया जा सके।
स्थानीय मुद्रा व्यापार की चुनौतियां
भारत के अनुभव से यह साफ है कि वैश्विक तेल व्यापार अब केवल अमेरिकी डॉलर के भरोसे नहीं है, बल्कि प्रतिबंधों और बैंकिंग बाधाओं से बचने के लिए देशों ने वैकल्पिक रास्ते तलाश लिए हैं। भारत के लिए अपनी घरेलू मुद्रा ‘रुपये’ में व्यापार करना आयात की निरंतरता बनाए रखने के लिए बेहद फायदेमंद है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तेल निर्यातक देशों के लिए स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपये) में बड़ा फंड जमा करना तब तक एक बड़ी चुनौती बना रहता है, जब तक कि वे उस पैसे का इस्तेमाल भारत से अन्य सामान (जैसे कृषि उत्पाद, दवाएं या मशीनरी) आयात करने में न कर सकें। यदि ईरान भारत से अपना आयात नहीं बढ़ाता है, तो संचित रुपये का उपयोग करना उसके लिए मुश्किल हो सकता है।
वैश्विक ऊर्जा व्यापार के बदलते समीकरण
अमेरिका द्वारा जारी अस्थाई प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) ने ईरान को अधिक खुले तौर पर और पारंपरिक वित्तीय चैनलों के माध्यम से तेल बेचने की अनुमति दी है। गवर्नर हेम्माती के अनुसार, अमेरिकी पक्ष ने डॉलर में भी निपटान (Settlement) की पुष्टि की है, लेकिन ईरान अपनी जरूरत और हितों के हिसाब से वैकल्पिक मुद्राओं का चयन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
यह समझौता भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने और खाड़ी क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने का एक शानदार अवसर प्रदान करता है।
