वाराणसी । मंगलवार, 16 जून 2026
उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी (बनारस) इन दिनों एक बड़े विकास कार्य और उससे उपजे गंभीर विवाद का केंद्र बनी हुई है। ₹350 करोड़ की भारी-भरकम लागत से काशी रेलवे स्टेशन को एयरपोर्ट जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं वाले ‘इंटर-मॉडल स्टेशन’ और मल्टी-मॉडल हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। रेल, बस और जल परिवहन (नमो घाट के माध्यम से) को एक साथ जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना के बीच अब कई सदियों पुराने धार्मिक स्थल आ गए हैं।
बीते 2 जून 2026 को राजघाट के पास स्थित करीब 200 साल पुरानी ‘अजगैब शहीद मस्जिद’, दो मजारों और एक प्राचीन हनुमान मंदिर को जिला व रेल प्रशासन की संयुक्त कार्रवाई में भारी सुरक्षा के बीच हटा दिया गया था। अब इसी क्रम में, एक और ऐतिहासिक स्थल—गंज-ए-शहीदा मस्जिद पर बुलडोजर चलाने की तैयारी पूरी हो चुकी है, जिसके लिए रेलवे ने 20 जून 2026 तक की आखिरी समय-सीमा (अल्टीमेटम) तय की है।
क्या है रेलवे की नोटिस और प्रशासनिक तर्क?
काशी रेलवे स्टेशन के प्रथम प्रवेश द्वार (सर्कुलेटिंग एरिया) के सौंदर्यीकरण और विस्तारीकरण की राह में इस मस्जिद को रेलवे ने अपनी भूमि पर अवैध अतिक्रमण माना है। रेलवे प्रशासन द्वारा मस्जिद परिसर पर चस्पा किए गए नोटिस में निम्नलिखित मुख्य बातें कही गई हैं:
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अदालती आदेश का हवाला: रेलवे के अनुसार, यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम अंजुमन इंतज़ामिया (मूलवाद संख्या-1174/1991) जो कि माननीय सिविल जज (जूनियर डिवीजन) वाराणसी की अदालत में चल रहा था, उसे अदालत ने 28 अगस्त 2024 को खारिज कर दिया था। इसके बाद इस निर्माण को हटाने का विधिक रास्ता साफ हुआ।
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20 जून की डेडलाइन: नोटिस में मस्जिद कमेटी को स्पष्ट रूप से सलाह दी गई है कि वे 20 जून 2026 से पहले अपने सभी आवश्यक और धार्मिक सामान वहां से हटा लें। इस अवधि के बाद रेलवे किसी भी दिन ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) की कार्रवाई शुरू कर सकता है।
मस्जिद कमेटी (अंजुमन इंतज़ामिया) का दावा
रेलवे के इस नोटिस के तुरंत बाद अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी भी सक्रिय हो गई है और उसने रेलवे की नोटिस के ठीक बगल में अपना जवाबी नोटिस चस्पा कर दिया है। कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी मोहम्मद यासीन ने रेलवे के दावों पर कड़े सवाल उठाए हैं और कुछ महत्वपूर्ण विधिक व ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत किए हैं जो इस मामले को एक नया मोड़ देते हैं:
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नोटिस की वैधता पर सवाल: कमेटी का आरोप है कि रेलवे द्वारा चस्पा की गई नोटिस भ्रामक है क्योंकि इस पर न तो कोई आधिकारिक तारीख (दिनांक) दर्ज है और न ही सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर या मुहर हैं।
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अदालती खारिज का असल सच: कमेटी ने स्पष्ट किया कि 1991 का मुकदमा किसी अंतिम मेरिट (गुण-दोष) के फैसले के आधार पर खारिज नहीं हुआ, बल्कि वह ‘अदम पैरवी’ (Lack of Prosecution/वकील की अनुपस्थिति) के कारण खारिज हुआ था। उस समय कमेटी के मुख्य अधिवक्ता रईस अंसारी की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं और उनका निधन हो गया था, साथ ही ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े संवेदनशील मुकदमे भी अपने चरम पर थे, जिसके कारण कोर्ट में उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी थी।
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मुकदमे का दायरा: कमेटी का दावा है कि 1991 का यह मुकदमा पूरी मस्जिद के खिलाफ नहीं, बल्कि मस्जिद के बाहर पूर्व दिशा की अतिरिक्त जमीन को बचाने के लिए दायर किया गया था।
1000 साल पुराना इतिहास बनाम 1887 की रेलवे
मस्जिद कमेटी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की है कि यह ढांचा रेलवे से कहीं पुराना है:
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ऐतिहासिक नक्शे: कमेटी के अनुसार, इस मस्जिद का निर्माण 1034 ईस्वी में हुआ था। इसका स्पष्ट उल्लेख 1880 के ‘क़िलाकोहना’ के नक्शे और 1883-84 के ब्रिटिश कालीन बंदोबस्त नक्शे (Settlement Records) में मिलता है।
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रेलवे का आगमन: राजघाट और काशी क्षेत्र में रेलवे का आगमन वर्ष 1887 में हुआ था। कमेटी का तर्क है कि जब रेलवे के आने से 850 साल पहले से मस्जिद वहां मौजूद थी, तो उसे रेलवे की जमीन पर ‘अवैध कब्जा’ कैसे कहा जा सकता है?
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स्वामित्व: यह संपत्ति उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड में विधिवत पंजीकृत है और सरकार के ‘उम्मीद पोर्टल’ पर भी इसका रजिस्ट्रेशन मौजूद है। कमेटी का यह भी दावा है कि पूर्व में खुद रेल प्रशासन ने अपने एक शपथ-पत्र में इसे मुसलमानों की निर्विवाद मिल्कियत तस्लीम किया था।
वर्तमान जमीनी स्थिति और संवेदनशीलता
इस समय गंज-ए-शहीदा मस्जिद परिसर में करीब 15 परिवार भी निवास करते हैं। 20 जून की समय-सीमा जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, इलाके में प्रशासनिक हलचल और तनाव देखा जा रहा है। जिला प्रशासन कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है, क्योंकि काशी रेलवे स्टेशन का विकास (जिसमें अंडरग्राउंड प्लेटफॉर्म, फूड प्लाजा, और आधुनिक लाउंज बनने हैं) सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलों पर अड़े हैं और देखना यह होगा कि 20 जून को प्रशासन सीधे कदम उठाता है या मामला दोबारा अदालत की चौखट पर पहुंचता है।
