भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती: ‘जनजातीय समाज सनातन का अभिन्न अंग’, अमित शाह का मतांतरण और यूसीसी पर बड़ा बयान

नई दिल्ली । रविवार, 24 मई 2026

राजधानी दिल्ली में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के ऐतिहासिक अवसर पर एक विशाल ‘जनजातीय महाकुंभ’ का आयोजन किया गया। इस भव्य समागम में देशभर से आदिवासी समुदायों के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक गीतों के साथ पहुंचे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासी समाज को सनातन परंपरा का अभिन्न हिस्सा बताया और सांस्कृतिक विघटन व जबरन मतांतरण पर तीखा प्रहार किया।

शाह ने स्पष्ट किया कि यह समागम केवल एक साधारण आयोजन नहीं है, बल्कि यह भगवान बिरसा मुंडा के ऐतिहासिक ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) की भावना से प्रेरित देश को एक सूत्र में पिरोने वाला सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन है। इस महाकुंभ में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, मंत्री केदार कश्यप, सांसद महेश कश्यप सहित जनजातीय समाज के सैकड़ों प्रमुख लोग उपस्थित रहे।

जल-जंगल-पहाड़ और सस्टेनेबल जीवन पद्धति

गृहमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भले ही उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा, लेकिन इस महाकुंभ में उमड़े जनसैलाब के संघर्ष और ऊर्जा में वे बिरसा मुंडा की आत्मा को जीवंत देख पा रहे हैं। उन्होंने आदिवासी समाज की जीवनशैली की सराहना करते हुए कहा:

“जनजातीय समाज का प्रकृति पूजन, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ों से जुड़ा जीवन और उनकी सामूहिक संस्कृति ही भारत की सबसे बड़ी सस्टेनेबल (टिकाऊ) जीवन पद्धति है।”

मतांतरण और सांस्कृतिक विघटन के खिलाफ कड़ा संदेश

अपने भाषण के दौरान अमित शाह ने बिना किसी का नाम लिए मतांतरण के मुद्दे पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वनवासी समाज का प्रकृति के प्रति आदर ही उसे सीधे तौर पर सनातन संस्कृति से जोड़ता है। कुछ ताकतें एक सोची-समझी साजिश के तहत जनजातीय समाज को उसकी प्राचीन जड़ों और गौरवशाली परंपराओं से काटने का प्रयास कर रही हैं।

उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि देश का संविधान हर नागरिक को अपने मूल धर्म, संस्कृति और परंपराओं के साथ सम्मानपूर्वक जीने का पूरा अधिकार देता है, लेकिन किसी को भी लोभ, लालच या दबाव बनाकर जबरन मतांतरण कराने का अधिकार नहीं है।

रामकथा के प्रसंगों से सांस्कृतिक एकता का प्रमाण

आदिवासी समाज और सनातन परंपरा के बीच मतभेद पैदा करने वालों को जवाब देते हुए शाह ने रामायण के प्रसंगों को याद किया। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर और निषादराज के चरण धोकर सदियों पहले यह संदेश दे दिया था कि वनवासी समाज और सनातन संस्कृति अलग नहीं हैं। ये दोनों एक ही सांस्कृतिक चेतना के दो मुख्य स्तंभ हैं।

समान नागरिक संहिता (UCC) और पेसा कानून पर फैले भ्रम का निवारण

समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर आदिवासी समाज में फैलाई जा रही आशंकाओं पर गृहमंत्री ने स्थिति साफ की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में भरोसा दिलाया कि भाजपा शासित राज्यों में लागू होने वाले यूसीसी में जनजातीय समुदायों की विशिष्ट परंपराओं, प्रथाओं और रीति-रिवाजों की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान किए गए हैं। यूसीसी के आने से आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्था या किसी भी परंपरा से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

इसके अतिरिक्त उन्होंने मोदी सरकार द्वारा जनजातीय सशक्तिकरण के लिए उठाए गए कदमों का विवरण दिया, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:

  • पेसा (PESA) कानून का प्रभावी क्रियान्वयन।

  • शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए एकलव्य मॉडल स्कूलों का विस्तार।

  • मुफ्त राशन, सुरक्षित आवास योजनाएं।

बजटीय आवंटन में ऐतिहासिक वृद्धि

गृहमंत्री ने आंकड़ों के जरिए पूर्ववर्ती सरकारों और वर्तमान सरकार की प्राथमिकताओं का अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जहाँ कांग्रेस के शासनकाल के दौरान जनजातीय कल्याण का कुल बजट महज 28 हजार करोड़ रुपये हुआ करता था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसे लगभग 5 गुना बढ़ाकर अब डेढ़ लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया गया है। यह दर्शाता है कि आदिवासी समाज का सर्वांगीण विकास वर्तमान सरकार की सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  1. ऐतिहासिक वर्षगांठ स्पष्टता: भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को हुआ था। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2021 में 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ घोषित किए जाने के बाद से, वर्ष 2024-2025 के कालखंड को उनकी 150वीं जयंती वर्ष (समारोह पखवाड़े) के रूप में देशव्यापी स्तर पर बड़े सांस्कृतिक आंदोलनों और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (जैसे ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’) के साथ मनाया जा रहा है।

  2. UCC का राज्यवार प्रभाव: जैसा कि गृहमंत्री ने उल्लेख किया, उत्तराखंड जैसे राज्यों में पारित यूसीसी कानूनों में अनुसूचित जनजातियों (ST) को इसके दायरे से पूरी तरह बाहर रखकर उनकी पारंपरिक सामाजिक और वैवाहिक व्यवस्थाओं को पूर्ण संरक्षण दिया गया है।

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