रिश्ते, धोखा और हक की लड़ाई: ‘तीसरी बेगम’ में महिला सशक्तिकरण का नया रूप

Saransh Kanaujia
6 Min Read

मुंबई । शनिवार, 30 मई 2026

हिंदी सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है। समय-समय पर बड़े पर्दे पर सामाजिक कुरीतियों, पितृसत्ता (पुरुष प्रधान व्यवस्था) और महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को प्रमुखता से दिखाया जाता रहा है। ट्रिपल तलाक, अंतर-धार्मिक विवाह और ‘लव जिहाद’ जैसे विषय अक्सर समाज में गंभीर बहस का कारण बनते हैं। इसी कड़ी में, दिग्गज फिल्ममेकर के.सी. बोकाडिया एक बेहद संवेदनशील और सामाजिक ड्रामा फिल्म ‘तीसरी बेगम’ लेकर आए हैं, जो दर्शकों को रिश्तों, भरोसे और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े कई तीखे सवालों पर सोचने के लिए मजबूर करती है।

क्या है ‘तीसरी बेगम’ की कहानी?

फिल्म की कहानी ‘पूजा दीक्षित’ नाम की एक बेहद सीधी और भोली-भाली लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। पूजा की जिंदगी में तब एक भयानक मोड़ आता है, जब धोखे से उसकी शादी ‘बब्बन खान’ नाम के व्यक्ति से करा दी जाती है। निकाह के बाद पूजा का नाम बदलकर ‘नगमा’ रख दिया जाता है।

जल्द ही पूजा के सामने एक ऐसा कड़वा सच आता है जो उसे झकझोर कर रख देता है—बब्बन खान की पहले से ही दो बीवियां हैं और वह उसकी ‘तीसरी बेगम’ बनकर उस घर में आई है। खुद को धोखे के जाल में फंसा पाकर पूजा असहाय महसूस करती है, लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब उसे अपनी दोनों सौतनों—’शबाना’ और ‘तबस्सुम’ का साथ मिलता है।

महिला सशक्तिकरण का अनोखा चेहरा: आमतौर पर फिल्मों में सौतनों के बीच ईर्ष्या और झगड़े दिखाए जाते हैं, लेकिन यहाँ तीनों महिलाएं अपने अत्याचारी पति के खिलाफ एकजुट होती हैं। वे अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को वापस पाने के लिए एक साथ खड़े होने का संकल्प लेती हैं।

60 से ज्यादा हिट फिल्में दे चुके के.सी. बोकाडिया का निर्देशन

बॉलीवुड में ‘तेरी मेहरबानियां’, ‘प्यार झुकता नहीं’, ‘आज का अर्जुन’, ‘फूल बने अंगारे’ और ‘हम तुम्हारे हैं सनम’ जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले निर्माता-निर्देशक के.सी. बोकाडिया ने हमेशा महिला प्रधान (Heroine Oriented) और सामाजिक मुद्दों के सिनेमा को तरजीह दी है।

इस फिल्म में भी उनके निर्देशन की गहरी समझ साफ दिखाई देती है। उन्होंने इतने संवेदनशील और विवादित विषय को बेहद अनुभवी तरीके से पर्दे पर उतारा है। चाहे कलाकारों से बेहतरीन अभिनय निकालना हो, दमदार संवाद (डायलॉग्स) लिखने हों या सिर्फ चेहरे के हाव-भाव से सीन को असरदार बनाना हो—बोकाडिया साहब ने अपना काम शत-प्रतिशत बखूबी किया है।

फिल्म के मुख्य तकनीकी और रचनात्मक पहलू

यह फिल्म न सिर्फ अपनी कहानी बल्कि अपने फिल्मांकन के कारण भी प्रभावित करती है:

  • स्टार कास्ट का दमदार अभिनय: मुग्धा गोडसे, कायनात अरोड़ा, रचना श्याम और अनुभवी अभिनेत्री ज़रीना वहाब ने अपने किरदारों को स्क्रीन पर जीवंत कर दिया है। इनके अलावा केविन गांधी ने भी सराहनीय काम किया है।

  • वास्तविक लोकेशंस: फिल्म की शूटिंग लखनऊ और बनारस की रियल लोकेशंस पर की गई है। इन शहरों की गलियां और माहौल कहानी में एक अलग किरदार की तरह उभर कर सामने आते हैं।

  • सेंसर बोर्ड का ‘A’ सर्टिफिकेट: फिल्म की बोल्ड विषय-वस्तु और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को देखते हुए सेंसर बोर्ड ने इसे ‘A’ (Adults Only) सर्टिफिकेट दिया है।

  • सच्ची घटनाओं से प्रेरित: यह फिल्म एक सोशल ड्रामा है जिसकी जड़ें असल जिंदगी की घटनाओं से जुड़ी हुई हैं। यह ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्मों की तरह ही समाज के अनछुए पहलुओं को उजागर करती है।

आपको यह फिल्म क्यों देखनी चाहिए?

‘तीसरी बेगम’ सिर्फ एक उपदेश देने वाली फिल्म नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से कमर्शियल सिनेमा (व्यावसायिक फिल्म) के ढांचे में ढाली गई है। 1 घंटा 52 मिनट की इस फिल्म में भरपूर एक्शन, सुरीला संगीत, बेहतरीन संवाद और शानदार अदाकारी का तड़का है। यदि आप सामाजिक संदेश के साथ-साथ एक मनोरंजक और झकझोर देने वाली कहानी देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।

फिल्म से जुड़े महत्वपूर्ण विवरण (एक नज़र में)

श्रेणीविवरण
निर्देशक व निर्माताके.सी. बोकाडिया (BMB प्रोडक्शन)
मुख्य कलाकारमुग्धा गोडसे, कायनात अरोड़ा, ज़रीना वहाब, रचना श्याम
मुख्य विषयबहुविवाह, धोखा, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक कुरीतियां
सेंसर रेटिंग‘A’ (केवल वयस्कों के लिए)
अवधि1 घंटा 52 मिनट

अतिरिक्त जानकारी

फिल्म निर्माण के दौरान सेंसर बोर्ड और प्रमाणन प्रक्रियाओं को लेकर कुछ कानूनी अड़चनें सामने आई थीं, जिन्हें पूरी तरह से सुलझा लिया गया है। फिल्म के कुछ संवादों में आवश्यक बदलाव करने के बाद इसे सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की पूरी अनुमति मिल चुकी है। यह फिल्म समाज की रूढ़िवादी सोच पर कड़ा प्रहार करने के साथ-साथ यह संदेश देती है कि जब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए एकजुट होती हैं, तो बड़ी से बड़ी अत्याचारी व्यवस्था को भी झुकना पड़ता है।

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