हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘कानून पर्याप्त, क्रियान्वयन जरूरी’

Saransh Kanaujia
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नई दिल्ली । बुधवार,  29 अप्रैल 2026

बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने हेट स्पीच (नफरत फैलाने वाले भाषण) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि भारत में नफरत फैलाने वाले भाषणों से निपटने के लिए विधायी शून्य (Legislative Vacuum) नहीं है। न्यायालय ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून, विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), ऐसे अपराधों को रोकने के लिए पर्याप्त हैं।

मुख्य सुधार और न्यायालय की टिप्पणियां

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि हेट स्पीच के लिए अलग से कोई विशेष कानून नहीं है, लेकिन कोर्ट ने इस धारणा को गलत बताया। पीठ ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  1. न्यायपालिका बनाम विधायिका: कोर्ट ने दोहराया कि अपराध तय करना और सजा का निर्धारण करना विधायिका का काम है। न्यायपालिका कानून की व्याख्या कर सकती है, लेकिन नया कानून नहीं बना सकती।

  2. लागू करने में कमी: याचिकाकर्ताओं की शिकायत कानून की कमी से नहीं, बल्कि इसके प्रवर्तन (Enforcement) में कमी से है। पुलिस को संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करने के लिए ललिता कुमारी मामले के दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

  3. विधि आयोग की सिफारिशें: कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि सरकार चाहे तो 267वीं रिपोर्ट (2017) में दिए गए विधि आयोग के सुझावों पर विचार कर सकती है, जिसमें हेट स्पीच के लिए विशिष्ट धाराओं को जोड़ने की बात कही गई थी।

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