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भारत को समझने के लिए संस्कृत भाषा को भी समझना होगा – भय्याजी जोशी

Saransh Kanaujia
3 Min Read

पुणे, 22 जनवरी 2026।

संस्कृत भारती पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत की ओर से आयोजित 10 संस्कृत पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि भारत में कोई भी भाषा संस्कृत के बिना नहीं है। इसलिए, भारतीय दर्शन, विज्ञान, विचार और जीवन मूल्यों को समझने के लिए संस्कृत भाषा के सिवा कोई विकल्प नहीं है। भारतीयता या हिन्दू धर्म सही अर्थों में  संस्कृत के बिना अधूरा है।

तिलक रोड पर स्थित गणेश सभागार में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. वेम्पति कुटुंबशास्त्री, अखिल भारतीय गीता शिक्षा प्रमुख शिरीष भेड़सगांवकर, संस्कृत भारती के पश्चिम मध्य क्षेत्र के अध्यक्ष और डेक्कन कॉलेज अभिमत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रसाद जोशी, पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के अध्यक्ष कर्नल सतीश परांजपे, पुणे महानगर अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र सिधये आदि उपस्थित थे।

भय्याजी जोशी ने कहा कि जो लोग भारत को नहीं समझते, उनसे यह सुनने को मिलता है कि संस्कृत भाषा मृत हो गई है। उन्होंने कहा, “इज़राइल ने हिब्रू भाषा को, जो संस्कृत से भी ज़्यादा मृत थी, फिर से जीवंत किया और उसे व्यवहार में लाया। इसके लिए हमें भाषा के प्रति आत्म-सम्मान रखना चाहिए। सभी भाषाओं में संस्कृत के समान शब्द होने पर भी हम संस्कृत की परवाह नहीं करते। संस्कृत के मूल शब्दों का अनुवाद नहीं किया जा सकता। इसलिए, भारत को समझने के लिए हमें संस्कृत भाषा को ही समझना होगा।”

पुणे के गणेश सभागार में 10 संस्कृत पुस्तकों का विमोचन करते भय्याजी जोशी और प्रो. वेम्पति कुटुंबशास्त्री।

कुटुंबशास्त्री ने कहा कि संस्कृत भारत की संपत्ति है। “जीवन के हर क्षेत्र में नई खोजें की जा रही हैं। पुराने सिद्धांतों की सीमाएं सामने आ रही हैं। लेकिन संस्कृत में कोई भी दर्शन अथवा सिद्धांत आज तक अप्रासंगिक सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए, भारत के उद्धार के लिए सभी को संस्कृत भाषा के उत्थान में  योगदान देना चाहिए।”

कार्यक्रम में ‘वंदना चंद्रनाग्रामात्’, ‘ग्रन्थरत्नरश्मिः’, ‘प्रभुचित्तम्’, ‘वर्तमानसंदर्भे हिंदुत्वस्य’, ‘ध्वनिः’, ‘भाषा-विश्लेषणरश्मिः’, ‘अस्माकं गृहम्’, ‘उद्गाराः’, ‘भरतमुनिप्रणीतं नाट्यशास्त्रम्’ और ‘कौटिलीयार्थशास्त्रम्’ पुस्तकों का विमोचन किया गया।

भेड़सगांवकर ने प्रास्ताविक किया, मुक्ता मराठे ने सूत्रसंचालन किया तथा रामचंद्र सिधये ने आभार प्रकट किया।

साभार : विश्व संवाद केंद्र

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