सरकारी स्कूलों में फोटो-वीडियो बैन: राजस्थान और UP के प्रतिबंधों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, जानें पूरा विवाद

Saransh Kanaujia
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लखनऊ | रविवार, 23 अगस्त 2026
उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बिना प्रिंसिपल या शिक्षा विभाग की पूर्व अनुमति के फोटो खींचने, वीडियो बनाने और सोशल मीडिया रील्स शूट करने पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर विवाद गहरा गया है। राज्य सरकारों के इन सख्त निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जिससे शिक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और निजता के अधिकारों के बीच कानूनी बहस छिड़ गई है।

क्या है पूरा मामला और सरकारों के आदेश?

राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभागों ने हाल ही में अलग-अलग परिपत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति, पत्रकार या सोशल मीडिया क्रिएटर बिना लिखित अनुमति के स्कूल परिसर में वीडियोग्राफी या कवरेज नहीं कर सकता।
  • राजस्थान शिक्षा विभाग का आदेश: स्कूल परिसर के भीतर सोशल मीडिया कंटेंट या रील्स बनाने और शिक्षकों द्वारा शिक्षण समय में फोन के इस्तेमाल पर कड़ा नियंत्रण लागू किया गया है।
  • उत्तर प्रदेश सरकार का कदम: प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में अनधिकृत लोगों और यूट्यूबरों द्वारा बिना अनुमति जाकर वीडियो बनाने तथा बच्चों के इंटरव्यू लेने पर रोक लगाई गई है।

सुप्रीम कोर्ट में PIL: विरोध में क्या तर्क दिए गए?

सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में राज्यों के इन आदेशों को असंवैधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने वाला बताया गया है।
  1. पारदर्शिता पर चोट: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रकार के बैन से सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील की बदहाल स्थिति, खस्ताहाल इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षकों की अनुपस्थिति और भ्रष्टाचार को जनता के सामने लाने का जरिया बंद हो जाएगा।
  2. सिटिजन ओवरसाइट खत्म होना: मीडिया और आम नागरिकों की निगरानी से स्कूलों में सुधार की गुंजाइश बनी रहती थी, जिसे अब आधिकारिक अनुमति की दीवार के पीछे छिपाया जा रहा है।

सरकार और समर्थकों का पक्ष: सुरक्षा और निजता का सवाल

दूसरी ओर, राज्य सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों ने इस प्रतिबंध का बचाव करते हुए कई प्रमुख बिंदु सामने रखे हैं:
पक्ष मुख्य तर्क / आधार
बाल सुरक्षा (Child Safety) अनधिकृत वीडियोग्राफी से बच्चों की गोपनीयता और सुरक्षा खतरे में पड़ती है।
पढ़ाई का माहौल कंटेंट क्रिएटर्स और यूट्यूबर्स के बिना अनुमति प्रवेश से कक्षाओं के संचालन में व्यवधान पैदा होता है।
शिक्षक गरिमा अध्यापकों पर बिना इजाजत कैमरे लगाकर उनसे अभद्र व्यवहार या सनसनीखेज कंटेंट बनाने की कोशिशों पर रोक।

कानूनी और संवैधानिक पहलू: Article 19(1)(a) बनाम Article 21

यह मामला संविधान के दो मौलिक अधिकारों के टकराव को रेखांकित करता है:
  • अनुच्छेद 19(1)(a) – सूचना और अभिव्यक्ति का अधिकार: इसके तहत जनता और मीडिया को सरकारी संस्थानों के कामकाज और अव्यवस्थाओं को उजागर करने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 21 – निजता और गरिमा का अधिकार (Puttaswamy Judgment): बच्चों की निजता और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल प्राप्त करने का मौलिक अधिकार। सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि क्या यह बैन “उचित प्रतिबंध” (Reasonable Restrictions) के दायरे में आता है या नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1. क्या सरकारी स्कूलों में मीडिया का प्रवेश पूरी तरह से बैन है?
नहीं, कवरेज या रिपोर्टिंग के लिए संबंधित स्कूल के प्रधानाचार्य (Principal) या जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है।
Q2. इस प्रतिबंध के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में क्यों दायर की गई है?
याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह नियम सरकारी स्कूलों में भ्रष्टाचार और कमियों को छिपाने के लिए बनाया गया है, जो जनता के जानने के अधिकार का उल्लंघन है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह लेख राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभागों के हालिया प्रशासनिक आदेशों तथा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के सार्वजनिक आंकड़ों पर आधारित है। मामले पर अंतिम फैसला अदालत के क्षेत्राधिकार में है। ताज़ा और सटीक खबरों के लिए मातृभूमि समाचार देखें।

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