क्या ट्रंप का ‘टैरिफ वार’ बिगाड़ेगा भारत-रूस के रिश्ते? जानें 2026 की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती

Saransh Kanaujia
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नई दिल्ली. साल 2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल के साथ हुई है। एक तरफ जहां दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने ‘समय की कसौटी पर खरे उतरे’ रिश्तों को नई ऊर्जा दी है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘ग्रीनलैंड टैरिफ’ नीति ने दुनिया भर के बाजारों और कूटनीति में खलबली मचा दी है। इन दो ध्रुवों के बीच भारत जिस तरह से संतुलन बना रहा है, वह उसकी विदेश नीति की परिपक्वता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

1. पुतिन का भारत दौरा: भरोसे की नई इबारत

दिसंबर 2025 में संपन्न हुआ 23वां भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन केवल औपचारिक नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच हुई ‘कार डिप्लोमेसी’ ने दुनिया को संदेश दिया कि पश्चिम के दबाव के बावजूद भारत रूस को अपना सबसे विश्वसनीय साझेदार मानता है।

  • प्रमुख उपलब्धियां: व्यापार को 2030 तक $100 बिलियन तक ले जाने का लक्ष्य और कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के विस्तार पर सहमति।

  • सामरिक संदेश: भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी रक्षा जरूरतें और ऊर्जा सुरक्षा किसी तीसरे देश के वीटो का विषय नहीं हैं।

2. ट्रंप का ‘ग्रीनलैंड कार्ड’ और टैरिफ की चुनौती

राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को अमली जामा पहनाने के लिए यूरोप पर 10-25% टैरिफ लगाने की घोषणा की है। यह भारत के लिए एक चेतावनी भी है और मौका भी।

  • भारत के लिए खतरा: ट्रंप प्रशासन ने भारत द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदने पर $50\%$ तक टैरिफ लगाने की धमकी दी है। अमेरिका की यह ‘ट्रांजेक्शनल डिप्लोमेसी’ (लेन-देन की कूटनीति) भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती पेश कर रही है।

  • संभावित अवसर: यदि अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के बीच व्यापारिक युद्ध छिड़ता है, तो भारत के टेक्सटाइल, चमड़ा और रत्न उद्योग के लिए यूरोपीय बाजार में बड़े अवसर खुल सकते हैं।

3. ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की परीक्षा

मौजूदा दौर में भारत की विदेश नीति ‘बहु-ध्रुवीय विश्व’ (Multi-polar world) की पैरोकार है।

  • रूस के साथ: भारत ब्रिक्स (BRICS) और SCO के माध्यम से यूरेशियाई क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

  • अमेरिका के साथ: टैरिफ विवादों के बावजूद, ‘क्वाड’ (Quad) और रक्षा प्रौद्योगिकियों (iCET) के मामले में भारत और अमेरिका का साथ रहना दोनों की मजबूरी है।

4. निष्कर्ष: भारत का अपना रास्ता

भारत आज उस मोड़ पर है जहां वह न तो अमेरिका का ‘कनिष्ठ साझेदार’ (Junior Partner) बनना चाहता है और न ही रूस का ‘अंध समर्थक’। ट्रंप की अनिश्चित नीतियों और पुतिन की पारंपरिक मित्रता के बीच भारत की मजबूती उसकी ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता’ में छिपी है। 2026 का बजट और आगामी कूटनीतिक दौरे यह तय करेंगे कि भारत इस ‘टैरिफ सुनामी’ से अपनी अर्थव्यवस्था को कैसे सुरक्षित रखता है।

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