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जया एकादशी 2026: प्रेत योनि से मुक्ति दिलाता है यह व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पौराणिक कथा

Saransh Kanaujia
3 Min Read

नई दिल्ली. माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘जया एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार, यह एकादशी इतनी सौभाग्यशाली है कि इसका व्रत करने मात्र से मनुष्य को नीच योनियों (पिशाच या प्रेत योनि) से मुक्ति मिल जाती है।

वर्ष 2026 में जया एकादशी का व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार का दिन होने के कारण इस बार भगवान विष्णु की पूजा का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

जया एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष तिथियों का समय कुछ इस प्रकार है:

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 28 जनवरी 2026, शाम 07:45 बजे से

  • एकादशी तिथि समाप्त: 29 जनवरी 2026, रात 09:10 बजे तक

  • पारण (व्रत तोड़ने) का समय: 30 जनवरी 2026, सुबह 07:12 से 09:24 के बीच

जया एकादशी का महत्व (Significance)

शास्त्रों में वर्णित है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे मृत्यु के बाद नरक की यातनाएं नहीं सहनी पड़तीं। भगवान कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था कि इस एकादशी के पुण्य से ब्रह्महत्या जैसे पापों का प्रभाव भी क्षीण हो जाता है।

पूजा विधि: कैसे करें भगवान माधव की आराधना?

  1. संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।

  2. पूजन: भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएं। उन्हें पीले फूल, फल, अक्षत और तुलसी दल (सबसे महत्वपूर्ण) अर्पित करें।

  3. मंत्र: पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।

  4. जागरण: संभव हो तो रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करें।

  5. दान: अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराकर स्वयं पारण करें।

पौराणिक कथा: माल्यवान और पुष्पवती की मुक्ति

इंद्र की सभा में माल्यवान नाम का गंधर्व और पुष्पवती नाम की अप्सरा थी। एक बार गाते समय वे अपनी लय खो बैठे, जिससे देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्हें ‘पिशाच योनि’ में जाने का शाप दे दिया।

पिशाच योनि में उन्हें बहुत कष्ट हुए। संयोगवश माघ शुक्ल एकादशी के दिन उन्होंने अत्यंत दुखी होकर कुछ भी नहीं खाया और पूरी रात जागते हुए भगवान का ध्यान किया। उनकी इस अनजाने में हुई तपस्या से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें पिशाच योनि से मुक्त कर वापस स्वर्ग में स्थान दिया। तभी से इस एकादशी को ‘जया एकादशी’ कहा जाने लगा।

विशेष टिप: जया एकादशी पर भगवान विष्णु को केसर युक्त दूध का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

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