उत्तराखंड हाईकोर्ट शिफ्टिंग: सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल से हल्द्वानी ट्रांसफर को दी हरी झंडी, जनमत संग्रह का आदेश रद्द

Saransh Kanaujia
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देहरादून । गुरुवार, 15 जुलाई 2026

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने की अंतिम मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही देश की शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा वकीलों और वादियों (मुकदमेबाजों) के बीच कराए जाने वाले जनमत संग्रह (Referendum) के आदेश को भी पूरी तरह निरस्त कर दिया है.

यह फैसला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए सुनाया.

‘न्यायिक पक्ष से ऐसा आदेश नहीं दे सकता हाईकोर्ट’

शीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि बुनियादी ढांचे (Infrastructural issues) और कोर्ट की शिफ्टिंग से जुड़े मामले पूर्णतः प्रशासनिक (Administrative) प्रकृति के होते हैं. चीफ जस्टिस की पीठ ने स्पष्ट कहा, “हाईकोर्ट के पास न्यायिक पक्ष (Judicial side) से जनमत संग्रह कराने जैसा आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है. इस तरह के मुद्दों को राज्य सरकार और हाईकोर्ट को आपस में मिलकर प्रशासनिक स्तर पर सुलझाना चाहिए।”

6 हफ्ते में जमीन सौंपने और पर्यावरण का ध्यान रखने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को आदेश दिया है कि हल्द्वानी में हाईकोर्ट परिसर के लिए चिह्नित की गई जमीन को अगले 6 सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक वैधानिक मंजूरियों (Statutory clearances) के साथ हाईकोर्ट को सौंप दिया जाए.

पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा कि जमीन को “जैसी है, जहां है” की स्थिति में सौंप दिया जाए और क्षेत्र की हरियाली को नुकसान न पहुँचाया जाए.

क्या था पूरा विवाद और क्यों पड़ी शिफ्टिंग की जरूरत?

उत्तराखंड कैबिनेट ने साल 2022 में ही हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी ट्रांसफर करने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी. लेकिन मई 2024 में हाईकोर्ट ने गोलापार (हल्द्वानी) में प्रस्तावित 26 हेक्टेयर भूमि के करीब 75% हिस्से में वन क्षेत्र होने और पेड़ कटने की आशंका के चलते इस पर आपत्ति जताई थी. इसके बाद हाईकोर्ट ने ऑनलाइन पोर्टल खोलकर वकीलों और जनता की राय (जनमत संग्रह) लेने का निर्देश दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है.

नैनीताल से कोर्ट हटाने के प्रमुख कारण:

  1. मुकदमा संख्या में भारी वृद्धि: साल 2000 में स्थापना के समय मामलों की संख्या बेहद कम (356) थी, जो 2026 तक बढ़कर 61,000 से अधिक हो चुकी है.

  2. कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर: नैनीताल में अत्यधिक ट्रैफिक जाम, खराब कनेक्टिविटी और सर्दियों/बरसात में वकीलों व वादियों को होने वाली परेशानियां.

  3. आवास और इलाज की कमी: युवा वकीलों के लिए रहने का भारी खर्च और शहर में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं (Medical facilities) का अभाव.

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. उत्तराखंड हाईकोर्ट अब नैनीताल से कहां शिफ्ट होगा?

उत्तराखंड हाईकोर्ट अब नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट किया जाएगा।

2. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के किस आदेश को रद्द कर दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा वकीलों और आम जनता के बीच कराए जा रहे ऑनलाइन जनमत संग्रह (Referendum) के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

3. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जमीन हस्तांतरण के लिए कितना समय दिया है?

शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड सरकार को 6 हफ्ते (Six weeks) के भीतर सभी जरूरी मंजूरियों के साथ जमीन हाईकोर्ट को सौंपने का निर्देश दिया है।

4. नैनीताल से हाईकोर्ट को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

बढ़ते मुकदमों की संख्या (61,000+), नैनीताल में ट्रैफिक जाम, भौगोलिक दुर्गमता, वकीलों के लिए आवास की समस्या और पर्याप्त अस्पतालों की कमी के कारण यह कदम उठाया गया है।

Disclaimer (अस्वीकरण): यह लेख उपलब्ध कानूनी दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। कानूनी मामलों में आधिकारिक अपडेट के लिए कृपया संबंधित न्यायालय के आधिकारिक पोर्टल पर जाएं।

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