धर्म के नाम पर नदियों को प्रदूषित करने का अधिकार किसी को नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Saransh Kanaujia
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चेन्नई । सोमवार, 13 जुलाई 2026

पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि धार्मिक अनुष्ठानों या प्रथाओं के नाम पर किसी भी नागरिक को प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषित करने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार नहीं है।

यह आदेश जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस बी. पुगालेंधी की खंडपीठ ने तमिराबरानी नदी (Tamirabarani River) में श्राद्ध कर्म और अंतिम संस्कार से जुड़े अनुष्ठानों के दौरान बड़ी मात्रा में कपड़े, प्लास्टिक और अन्य सामग्रियां फेंके जाने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए दिया।

अनुच्छेद 25 और जनस्वास्थ्य: क्या कहता है संविधान?

अदालत ने याचिका की सुनवाई के दौरान भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 (Article 25) की व्याख्या की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। यह अधिकार पूरी तरह से जनस्वास्थ्य (Public Health), सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अधीन है। पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचाकर या दूसरों के अधिकारों का हनन करके किसी भी धार्मिक अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि प्रदूषण मुक्त पानी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है। इसके अलावा, नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के तहत अपनी नदियों, झीलों और वन्यजीवों की रक्षा करने का मौलिक कर्तव्य भी याद दिलाया गया।

तमिराबरानी नदी में प्रदूषण के खतरनाक आंकड़े

सुनवाई के दौरान नदी की सफाई में जुटे पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा कोर्ट के सामने बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक आंकड़े पेश किए गए:

  • दैनिक कचरा: तमिराबरानी नदी में प्रतिदिन 1 टन (1,000 किलोग्राम) से अधिक कपड़े और अनुष्ठान सामग्री फेंकी जा रही है।

  • मई 2026 की रिपोर्ट: महज तीन हफ्तों (7 मई से 28 मई) के भीतर नदी से करीब 86 से 90 टन कपड़े, 1,385 किलो प्लास्टिक कचरा, 220 किलो कांच की बोतलें और 115 किलो चप्पलें निकाली गईं।

  • ई-कोलाई का खतरा: सिंथेटिक और नायलॉन के कपड़े नदी के तल में फंस जाते हैं, जिससे पानी में ई-कोलाई (E. coli) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ जाता है, जो इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी जानलेवा है।

जलीय जीवों और कछुओं पर मंडराता संकट

नदी में फेंके जाने वाले कपड़ों के कारण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को भारी नुकसान हो रहा है। कोर्ट को बताया गया कि नदी में पाए जाने वाले दुर्लभ इंडियन ब्लैक टर्टल (Indian Black Turtle) और इंडियन फ्लैपशेल टर्टल (Indian Flapshell Turtle) जैसे कछुए इन कपड़ों में उलझ जाते हैं और दम घुटने से उनकी मौत हो रही है। इसके साथ ही, देवी-देवताओं या पूर्वजों के कांच वाले फोटो फ्रेम नदी में फेंकने से उनके टुकड़े जलीय जीवों और नदी साफ करने वाले कर्मियों को घायल कर रहे हैं।

अंधविश्वास नहीं, आस्था का सम्मान: कोर्ट का संवेदनशील रुख

खंडपीठ ने इस पूरे मामले में बेहद संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने लोगों की इस धार्मिक प्रथा को ‘अंधविश्वास’ कहने से इनकार कर दिया और माना कि यह करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं और गहरी आस्था से जुड़ा विषय है।

‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि वे सभी हितधारकों (Stakeholders), धार्मिक संगठनों और कार्यकर्ताओं को सुने बिना कोई भी एकतरफा निषेधात्मक आदेश पारित नहीं करेंगे। अदालत ने तिरुनेलवेली जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे जनता के बीच बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाएं। साथ ही, एक व्यावहारिक समाधान के रूप में नदी के किनारे कृत्रिम टैंक (Artificial Tanks) बनाने जैसे सुझावों पर विचार करने को कहा है ताकि परंपराएं भी पूरी हो सकें और नदी भी स्वच्छ रहे। मामले की अगली सुनवाई के लिए आगामी तारीख तय की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: मद्रास हाईकोर्ट ने नदी प्रदूषण को लेकर क्या मुख्य टिप्पणी की?

उत्तर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म की आड़ में किसी को भी जल स्रोतों को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) हमेशा जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के अधीन होती है।

प्रश्न 2: तमिराबरानी नदी में किस वजह से प्रदूषण फैल रहा है?

उत्तर: श्राद्ध कर्म और अंतिम संस्कार से जुड़े अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा नदी में अपने मृत परिजनों के कपड़े, चप्पलें, प्लास्टिक और कांच के फोटो फ्रेम फेंकने की वजह से प्रदूषण फैल रहा है।

प्रश्न 3: इस प्रदूषण से जलीय जीवों को क्या नुकसान हो रहा है?

उत्तर: नदी में फेंके गए कपड़ों में फंसकर इंडियन ब्लैक टर्टल और इंडियन फ्लैपशेल टर्टल जैसे दुर्लभ कछुओं का दम घुट रहा है और कांच के टुकड़ों से जीव घायल हो रहे हैं।

प्रश्न 4: क्या कोर्ट ने इस प्रथा पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया है?

उत्तर: नहीं, कोर्ट ने इसे लोगों की आस्था से जुड़ा मामला मानते हुए तुरंत प्रतिबंध नहीं लगाया है। कोर्ट ने प्रशासन, धार्मिक संस्थाओं और कार्यकर्ताओं से व्यावहारिक सुझाव मांगे हैं ताकि आस्था और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहें।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ द्वारा तमिराबरानी नदी प्रदूषण मामले (Sivanupandian v. District Collector) में दी गई कानूनी टिप्पणियों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक जागरूकता फैलाना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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