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ट्रंप सरकार का बड़ा ऐलान: वेनेजुएला का तेल अब अमेरिका के नियंत्रण में, भारत को भी मिल सकती है हिस्सेदारी

Saransh Kanaujia
3 Min Read

वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए बताया है कि वेनेजुएला की अंतरिम सरकार 30 से 50 मिलियन बैरल तेल अमेरिका को सौंपने जा रही है। इस तेल की बिक्री बाजार मूल्य पर की जाएगी, लेकिन इसकी सबसे खास बात यह है कि इससे होने वाली पूरी आय यानी राजस्व का नियंत्रण पूरी तरह से अमेरिकी सरकार के पास होगा।

अमेरिकी नियंत्रण और राजस्व का उपयोग

व्हाइट हाउस के अनुसार, इस तेल की बिक्री से प्राप्त होने वाली भारी-भरकम राशि को विशेष अमेरिकी-नियंत्रित खातों में रखा जाएगा। प्रशासन का कहना है कि इस धन का उपयोग “दोनों देशों (अमेरिका और वेनेजुएला) के लोगों” के कल्याण और लाभ के लिए किया जाएगा। यह कदम वेनेजुएला के ऊर्जा संसाधनों पर वैश्विक नियंत्रण और वहां की राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करने की दिशा में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

भारत के लिए खुले रास्ते

भारत के नजरिए से यह खबर बेहद सकारात्मक है। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की है कि अमेरिका इस नए ढांचे के तहत भारत को तेल बेचने के लिए तैयार है। यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो वह सीधे अमेरिकी नियंत्रण वाले माध्यमों से वेनेजुएला का कच्चा तेल खरीद सकेगा।

भारतीय रिफाइनरों में हलचल: रिलायंस की नजर

भारत की सबसे बड़ी निजी रिफाइनरी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, ने इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिकी सरकार गैर-अमेरिकी खरीदारों को इस तेल को खरीदने की औपचारिक अनुमति देती है, तो वह वेनेजुएला के कच्चे तेल की खरीद फिर से शुरू करने पर गंभीरता से विचार करेगी।

पृष्ठभूमि और महत्व:

  • पुराना नाता: अमेरिकी प्रतिबंधों के कड़े होने से पहले, भारत वेनेजुएला के कच्चे तेल के सबसे बड़े वैश्विक खरीदारों में से एक था। भारतीय रिफाइनरियां वेनेजुएला के ‘भारी कच्चे तेल’ (Heavy Crude) को प्रोसेस करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम हैं।

  • सस्ता विकल्प: भारत के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे तेल आयात के स्रोतों में विविधता आएगी और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा तेल मिल सकेगा।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से न केवल वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी, बल्कि यह दक्षिण एशिया में भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंधों को और मजबूती प्रदान करेगा। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत सरकार और तेल कंपनियां इस प्रस्ताव पर आधिकारिक तौर पर कितनी जल्दी आगे बढ़ती हैं।

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