ईरान-इजरायल युद्ध की आग में झुलसा पाकिस्तान: शहबाज शरीफ का ‘ट्रंप कार्ड’ पड़ा उल्टा, कराची में भारी हिंसा

Saransh Kanaujia
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इस्लामाबाद. पश्चिम एशिया (Middle East) में गहराते युद्ध के बाद अब इसका सबसे भीषण असर पाकिस्तान में देखने को मिल रहा है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हालिया हमलों ने न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिला दिया है, बल्कि पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ से निकलना नामुमकिन लग रहा है। एक तरफ सीमा पर तनाव है, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री का एक पुराना बयान अब उनके लिए ‘राजनीतिक सुसाइड नोट’ साबित हो रहा है।

शहबाज शरीफ का ‘ट्रंप कार्ड’ पड़ा उल्टा

सोशल मीडिया पर इस समय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का वह बयान आग की तरह फैल रहा है, जिसमें उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘शांति का दूत’ बताया था। पिछले वर्ष शरीफ ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की वकालत करते हुए कहा था कि उन्होंने कई युद्धों को रोका है।

आज जब ट्रंप की नीतियों और अमेरिकी समर्थन के साये में इजरायल द्वारा ईरान पर हमले किए जा रहे हैं, तो पाकिस्तान की आवाम इसे सरकार की ‘दोहरी चाल’ मान रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि शहबाज सरकार ने डॉलर की खातिर देश की संप्रभुता और धार्मिक भावनाओं को अमेरिका के पास गिरवी रख दिया है।

अली खामेनेई की मौत की खबरों से भड़का आक्रोश

फरवरी के अंत में आई ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की कथित मौत की खबरों ने पाकिस्तान में बारूद का काम किया है। पाकिस्तान की लगभग 15% से 20% शिया मुस्लिम आबादी इस समय बेहद गुस्से में है।

  • इस्लामाबाद, लाहौर और कराची जैसे बड़े शहरों में लोग सड़कों पर हैं।

  • प्रदर्शनकारियों ने डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के पुतले फूंके।

  • नारेबाजी में सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल को ‘मानवता का दुश्मन’ बताया जा रहा है।

कराची में खूनी संघर्ष: 26 मौतों से दहला देश

पिछले एक हफ्ते में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। सबसे भयावह स्थिति कराची में देखी गई, जहाँ प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास (Consulate) की ओर बढ़ने की कोशिश की।

ग्राउंड रिपोर्ट: सुरक्षा बलों की गोलीबारी और भगदड़ में अब तक कुल 26 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से 11 मौतें अकेले कराची में हुई हैं। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार द्वारा बल प्रयोग की कड़ी निंदा की है।

$40 अरब की मजबूरी और कूटनीतिक संतुलन

पाकिस्तान इस समय एक ‘इकोनॉमिक ट्रैप’ में है। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का पहिया विदेशी मुद्रा पर टिका है:

  1. विदेशी प्रेषण (Remittance): पाकिस्तान को हर साल लगभग 40 अरब डॉलर मिलते हैं, जिसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब और खाड़ी देशों से आता है।

  2. सऊदी-पाक रक्षा समझौता: सेना प्रमुख असीम मुनीर और सऊदी रक्षा मंत्री के बीच हालिया मुलाकात ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान ‘म्युचुअल डिफेंस पैक्ट’ के तहत सऊदी के पाले में खड़ा है।

पूर्व राजदूत मलीहा लोधी का मानना है कि यह गुस्सा अब केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘एंटी-अमेरिका सेंटिमेंट’ पूरे देश में फैल चुका है। सरकार अगर ईरान का साथ देती है तो सऊदी और अमेरिका नाराज होंगे, और अगर चुप रहती है तो देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

क्या पाकिस्तान संभाल पाएगा यह दबाव?

मौजूदा स्थिति में पाकिस्तान के पास विकल्प बहुत सीमित हैं। एक ओर ईरान के साथ जुड़ी लंबी सीमा (Border) सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है, तो दूसरी ओर आईएमएफ (IMF) और खाड़ी देशों की मदद के बिना देश का चलना मुश्किल है।

मुख्य निष्कर्ष:

  • शहबाज शरीफ का पुराना बयान सरकार की साख गिरा रहा है।

  • ईरान के प्रति जनता की सहानुभूति और अमेरिका के प्रति नफरत चरम पर है।

  • सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते ने पाकिस्तान की तटस्थता पर सवाल उठा दिए हैं।

 मातृभूमि समाचार – अंतरराष्ट्रीय खबरें

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