ताजमहल या तेजो महालय? सर्वे की मांग खारिज होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ता, केंद्र-ASI से जवाब तलब

Saransh Kanaujia
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प्रयागराज । सोमवार, 6 जुलाई 2026

विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर ताजमहल एक बार फिर कानूनी और ऐतिहासिक चर्चाओं के केंद्र में है। आगरा की जिला अदालत द्वारा ताजमहल परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण (ASI Survey) की मांग को खारिज किए जाने के बाद, याचिकाकर्ताओं ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

क्या है ताजमहल और तेजो महालय का पूरा विवाद?

ताजमहल को लेकर लंबे समय से यह विवाद खड़ा किया जाता रहा है कि यह मूल रूप से एक मकबरा है या फिर कोई प्राचीन हिंदू मंदिर। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि आगरा में यमुना नदी के किनारे स्थित यह ऐतिहासिक इमारत वास्तव में ‘भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान तेजो महालय मंदिर’ है।

याचिकाकर्ताओं के वकील के अनुसार, यह मुख्य मामला साल 2015 से ही आगरा के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पास लंबित है। इस मूल मुकदमे में आधिकारिक तौर पर यह घोषित करने की मांग की गई है कि ताजमहल परिसर के भीतर एक मंदिर मौजूद है। मामला लंबे समय से खिंचने के कारण, याचिकाकर्ता पक्ष ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (ADJ) की अदालत में एक अंतरिम अर्जी दाखिल कर ‘एडवोकेट कमिश्नर’ की नियुक्ति और पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने की मांग की थी।

निचली अदालतों ने क्यों खारिज की थी याचिका?

आगरा की जिला अदालत और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दोनों ही स्तरों पर इस याचिका को खारिज कर दिया गया था। अदालतों का मानना था कि बिना ठोस प्राथमिक साक्ष्यों के या वर्षों पुराने लंबित मुख्य मुकदमे के अंतिम फैसले से पहले इस प्रकार के सर्वेक्षण का आदेश नहीं दिया जा सकता। जिला कोर्ट के इसी आदेश को कानूनी चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता अब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं, जहां इस पर केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जवाब मांगा गया है।

पूर्व के न्यायिक फैसले और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का रुख

यह पहली बार नहीं है जब ताजमहल के इतिहास या उसके बंद कमरों को लेकर अदालत में याचिका दायर की गई हो। इससे पहले भी कई बार ताजमहल के बंद पड़े 22 कमरों को खोलने और उनके भीतर छिपे सच का पता लगाने के लिए फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी (Fact-Finding Committee) बनाने की मांग की जा चुकी है।

अदालतों ने पूर्व में ऐसी याचिकाओं को “गैर-न्यायसंगत” (Non-justiciable) बताते हुए खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि इतिहास से जुड़े शोध और तथ्यों की जांच का काम इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का है, न कि अदालतों का।

वहीं दूसरी ओर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हमेशा स्थापित ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह रुख अपनाया है कि ताजमहल 17वीं शताब्दी का एक मुगलकालीन मकबरा है, जिसे सम्राट शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था।

निष्कर्ष और आगे की राह

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए इस नोटिस के बाद अब गेंद केंद्र सरकार और एएसआई के पाले में है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में एएसआई का जवाब बेहद महत्वपूर्ण होगा क्योंकि वही देश की ऐतिहासिक विरासतों के संरक्षण और उनके इतिहास को प्रमाणित करने वाली सर्वोच्च संस्था है। इस मामले की अगली सुनवाई में आने वाले जवाबों से ही तय होगा कि ताजमहल के ‘तेजो महालय’ होने के दावों में कितनी कानूनी और वैज्ञानिक प्रासंगिकता है।

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