समयबद्ध केस निपटारे और स्थगन नीति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: “हम वकीलों से दुश्मनी नहीं चाहते”

Saransh Kanaujia
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नई दिल्ली । गुरुवार, 4 जून 2026

देशभर की अदालतों में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने और मामलों के समयबद्ध निपटारे (Time-bound Disposal) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने इस याचिका को सिरे से खारिज करते हुए देश भर की अदालतों के लिए अनियंत्रित स्थगन (Adjournment) पर कोई भी राष्ट्रीय गाइडलाइन जारी करने से साफ इनकार कर दिया है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद हल्के-फुल्के और मजाकिया अंदाज में एक बड़ी व्यावहारिक टिप्पणी की। बेंच ने कहा, “हम वकीलों से दुश्मनी नहीं लेना चाहते। हम वकीलों के दोस्त हैं।” कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इसके बजाय बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) या संबंधित राज्य बार काउंसिल और बार एसोसिएशनों के पास जाएं।

याचिका में क्या थीं प्रमुख मांगें?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहन की बेंच के सामने यह याचिका एक वकील (रजत) द्वारा व्यक्तिगत रूप से (In Person) दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का मुख्य उद्देश्य भारतीय न्यायिक प्रणाली में लगने वाले लंबे समय और अदालतों में बिना किसी ठोस नियंत्रण के मिलने वाले ‘स्थगन’ (तारीख पे तारीख) पर रोक लगाना था। याचिका में प्रमुख रूप से निम्नलिखित मांगें उठाई गई थीं:

  • नेशनल केस फ्लो मैनेजमेंट पॉलिसी: देशभर की सभी अदालतों (निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक) के लिए एक समान और लागू करने योग्य राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए।

  • चरणबद्ध समय-सीमा (Stage-wise Timelines): मुकदमों की सुनवाई के अलग-अलग पड़ावों (जैसे चार्जशीट, गवाही, जिरह और अंतिम बहस) के लिए एक सख्त डेडलाइन तय हो।

  • दिन-प्रतिदिन सुनवाई (Day-to-day Hearing): जो मामले उपयुक्त या गंभीर श्रेणी के हैं, उनमें तारीखें देने के बजाय लगातार रोजाना सुनवाई की व्यवस्था की जाए।

  • पुराने मामलों को प्राथमिकता: न्यायपालिका में सालों-साल से लंबित पड़े और सबसे पुराने मामलों को प्राथमिकता (Priority) के आधार पर निपटाने का नियम बने।

अदालतों के लिए कड़ा नियम क्यों नहीं बनाना चाहता सुप्रीम कोर्ट?

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब देश में करोड़ों केस पेंडिंग हैं, तो कोर्ट ने समय-सीमा तय करने वाली इस नीति को खारिज क्यों किया? कानूनी विशेषज्ञों और अदालत के रुख के अनुसार इसके पीछे गहरे व्यावहारिक कारण हैं:

न्यायिक स्वायत्तता और व्यावहारिक संकट: भारतीय न्यायपालिका में हर मामला अपने आप में अलग होता है। गवाहों का समय पर न पहुंचना, जांच एजेंसियों द्वारा दस्तावेजों की देरी, वकीलों की अपरिहार्य व्यस्तता या अचानक तबीयत खराब होना जैसी कई जमीनी हकीकतें होती हैं। अगर कोर्ट किसी कड़े फॉर्मूले में केसों को बांध देगा, तो व्यावहारिक रूप से निचली अदालतों (Subordinate Courts) का काम करना असंभव हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक सुधार के लिए बार (वकील) और बेंच (जज) के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध होना जरूरी है। बिना वकीलों के सहयोग और जमीनी हकीकत को समझे ऐसी किसी भी एकतरफा पॉलिसी को ऊपर से थोपा नहीं जा सकता।

लंबित मुकदमों की मौजूदा स्थिति और सुधार

हालांकि कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालतें देरी को रोकने के लिए गंभीर नहीं हैं। न्यायपालिका अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं के माध्यम से लगातार सुधार कर रही है:

  • आंतरिक सर्कुलर: सुप्रीम कोर्ट पहले ही एड्जॉर्नमेंट लेटर्स (स्थगन पत्रों) को लेकर कड़े नियम जारी कर चुका है, जिसमें बिना किसी ठोस पारिवारिक या चिकित्सीय आपातकाल (Medical Emergency) के बार-बार स्थगन लेने पर रोक लगाई गई है।

  • फैसले की समय-सीमा: हाल ही में हाई कोर्ट्स के लिए भी निर्देश जारी किए गए हैं कि आर्डर रिजर्व (फैसला सुरक्षित) रखने के अधिकतम 3 महीनों के भीतर निर्णय सुना दिया जाना चाहिए।

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