सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल: वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस से छूट किस कानूनी आधार पर मिले? जानिए क्या है पूरा विवाद

Saransh Kanaujia
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नई दिल्ली । सोमवार, 1 जून 2026

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए वक्फ संस्थानों की एक पुरानी मांग पर कड़े सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं से सीधा सवाल किया कि राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल की कानूनी कार्यवाही में वक्फ संस्थानों को ‘कोर्ट फीस’ (न्यायालय शुल्क) देने से छूट किस कानून के तहत मिलनी चाहिए।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ इस संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले मामले की सुनवाई कर रही है। यह पूरा मामला वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और अदालती प्रक्रियाओं में उनकी जवाबदेही से जुड़ा हुआ है।

क्या है मामला और विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?

यह कानूनी विवाद मुख्य रूप से गुजरात हाई कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर की गई अपील से जुड़ा है। दरअसल, गुजरात हाई कोर्ट ने अपने एक पूर्व फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि वक्फ संस्थानों को राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी याचिकाएं या विवाद पेश करते समय कोर्ट फीस देने से कोई विशेष वैधानिक छूट (Exemption) नहीं मिली हुई है।

हाई कोर्ट के इस रुख के कारण, पर्याप्त कोर्ट फीस न भरने की वजह से वक्फ से जुड़े कई मुकदमों को ट्रिब्यूनल द्वारा खारिज कर दिया गया था। जब इन फैसलों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, तो उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के कदमों को बिल्कुल सही और कानून सम्मत ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को क्या हुआ? (Latest Updates)

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संस्थानों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील एजाज मकबूल कोर्ट के समक्ष पेश हुए। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि वे गुजरात हाई कोर्ट के दिसंबर 2025 के फैसले को चुनौती देने के लिए कुछ और महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज और साक्ष्य रिकॉर्ड पर लाना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें थोड़े समय की आवश्यकता है।

इसी दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने वकील से तीखे और सीधे सवाल पूछे:

“आखिर आप किस आधार पर कोर्ट फीस से पूरी छूट का दावा कर रहे हैं? वह कौन सा विशिष्ट कानून या प्रावधान है जो आपको देश की अन्य संस्थाओं या नागरिकों के विपरीत कोर्ट फीस न देने की अनुमति देता है?”

वकील मकबूल ने अदालत को आश्वस्त किया कि वे अगली सुनवाई में इस विषय पर विस्तार से अपना कानूनी पक्ष और दलीलें रखेंगे। उन्होंने कोर्ट से मामले को अगस्त के पहले सप्ताह तक टालने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार करते हुए बेंच ने अगली सुनवाई 7 अगस्त के लिए तय कर दी है।

गुजरात हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की थीं वक्फ की दलीलें?

इससे पहले 17 दिसंबर 2025 को गुजरात हाई कोर्ट ने वक्फ संस्थानों की कई अपीलों को एक साथ खारिज कर दिया था। वक्फ संस्थानों ने वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83 (Section 83 of Waqf Act) का हवाला देते हुए एक अनोखा तर्क दिया था।

आवेदन बनाम सिविल सूट (Application vs. Civil Suit)

  • वक्फ संस्थानों का तर्क: उनका कहना था कि धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल के सामने जो मामले जाते हैं, वे एक ‘आवेदन’ (Application) के रूप में दर्ज होते हैं, न कि किसी औपचारिक ‘वाद’ या ‘सिविल सूट’ (Civil Suit) के रूप में। चूंकि यह एक सामान्य सूट नहीं है, इसलिए इस पर भारी कोर्ट फीस नहीं लगाई जानी चाहिए।

  • हाई कोर्ट का फैसला: गुजरात उच्च न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही तकनीकी रूप से इसे आवेदन कहा जाए, लेकिन वक्फ ट्रिब्यूनल के भीतर चलने वाली पूरी प्रक्रिया एक सिविल कोर्ट की तरह ही होती है। इसमें:

    1. दोनों पक्षों द्वारा लिखित बयान (Written Statements) दाखिल किए जाते हैं।

    2. सबूत और गवाहियां (Evidences) दर्ज की जाती हैं।

    3. मकान मालिक और किराएदार के विवादों जैसे गंभीर अधिकारों का अंतिम फैसला होता है।

न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह प्रक्रिया पूरी तरह से एक सिविल सूट की तरह चलती है, इसलिए इसमें तय कोर्ट फीस देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

इस फैसले का वक्फ संपत्तियों पर क्या असर होगा?

यदि सुप्रीम कोर्ट भी गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो देश भर के वक्फ बोर्डों और संस्थानों को अपने मुकदमों के लिए तय नियमानुसार कोर्ट फीस चुकानी होगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ट्रिब्यूनल में बेवजह या बिना मजबूत आधार के दाखिल होने वाले मुकदमों पर रोक लगेगी और प्रणाली में पारदर्शिता आएगी।

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