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मुगल बादशाह हुमायूं ने राज गद्दी के लिए अपनाया था क्रूर रास्ता, शेरशाह सूरी ने हिला दी थी नींव

Saransh Kanaujia
7 Min Read

मुगल बादशाह हुमायूं, जिन्हें अक्सर ‘इंसान-ए-कामिल’ (पूर्ण पुरुष) और दयालु शासक कहा जाता है, के शासनकाल से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जो उनकी छवि के विपरीत हैं। साम्राज्य को बचाने और विद्रोहियों को कुचलने के लिए बादशाह ने हाल के दिनों में कई कठोर निर्णय लिए हैं।

भाइयों के प्रति बदलता रुख: कामरान मिर्जा को दी गई दर्दनाक सजा

हुमायूं की उदारता ही अक्सर उनकी कमजोरी मानी जाती थी, लेकिन अपने भाई कामरान मिर्जा के बार-बार विद्रोह करने पर हुमायूं ने अंततः क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं।

  • सजा-ए-खौफनाक: विद्रोह को जड़ से खत्म करने के लिए हुमायूं ने कामरान मिर्जा की आँखें निकलवा दीं। यह सजा मुगल दरबार में चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि हुमायूं ने अपने पिता बाबर को वचन दिया था कि वह अपने भाइयों को कभी नुकसान नहीं पहुँचाएगा।

  • मक्का निर्वासन: आँखें फोड़ने के बाद कामरान को मक्का भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।

विद्रोहियों का कत्लेआम और सामूहिक दंड

इतिहासकारों और चश्मदीदों के अनुसार, हुमायूं ने अपनी सत्ता को चुनौती देने वालों के साथ कोई नरमी नहीं बरती:

  1. कंधार और काबुल की घेराबंदी: जब हुमायूं ने पुनः काबुल पर कब्जा किया, तो उन्होंने उन अमीरों और अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से कठोर दंड दिए जिन्होंने उनका साथ छोड़कर कामरान का साथ दिया था। कई लोगों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया गया।

  2. कान कटाना और अंग-भंग: युद्ध के दौरान पकड़े गए बागियों के नाक और कान काटने जैसे दंड हुमायूं के काल में भी प्रचलित रहे, ताकि जनता के मन में भय बना रहे।

युद्ध का उन्माद: चंपानेर की विजय

गुजरात अभियान के दौरान चंपानेर के किले पर विजय प्राप्त करने के बाद, हुमायूं ने भारी खूनखराबे की अनुमति दी थी। ऐसा कहा जाता है कि किले के भीतर छिपे हुए सैनिकों और सहायकों को खोजने के लिए उन्होंने बेहद सख्त तलाशी अभियान चलाया, जिसमें कई निर्दोष लोग भी मारे गए।

“हुमायूं स्वभाव से क्रूर नहीं थे, लेकिन उस दौर की राजनीति और अपनों के विश्वासघात ने उन्हें कठोर बनने पर मजबूर कर दिया। कामरान मिर्जा के साथ किया गया व्यवहार उनके जीवन का सबसे विवादित और क्रूर फैसला माना जाता है।”

विशेष समाचार: शेरशाह सूरी की ‘अजेय’ रणनीतियाँ—कैसे एक जागीरदार ने हिला दी मुगल सल्तनत की नींव?

हुमायूं के सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी शेरशाह सूरी (फरीद खान) को इतिहास में न केवल एक कुशल प्रशासक, बल्कि एक महान सैन्य रणनीतिकार के रूप में भी जाना जाता है। उनकी रणनीतियों ने ही मुगलों की विशाल सेना को धूल चटा दी थी।

मुगल बादशाह हुमायूं को भारत छोड़ने पर मजबूर करने वाले अफगान शासक शेरशाह सूरी की सफलता का राज उनकी तलवार से ज्यादा उनके ‘दिमाग’ और ‘युद्ध कौशल’ में छिपा था। इतिहासकारों के अनुसार, शेरशाह ने युद्ध के मैदान में मुगलों की परंपरागत युद्ध शैली (तुलुगमा पद्धति) का मुकाबला अपनी ‘छापामार’ और ‘धोखाधड़ी’ की रणनीतियों से किया।

1. चौसा की जंग: प्रकृति और समय का सही इस्तेमाल

1539 में चौसा के युद्ध में शेरशाह ने अपनी रणनीतिक बुद्धिमानी का लोहा मनवाया।

  • रणनीति: उन्होंने हुमायूं को गंगा और कर्मनाशा नदियों के बीच के निचले इलाके में शिविर लगाने के लिए मजबूर किया।

  • हमले का समय: शेरशाह ने महीनों तक शांति वार्ता का नाटक किया, जिससे मुगल सेना बेफिक्र हो गई। जैसे ही मानसून आया और मुगल शिविर पानी में डूबने लगा, शेरशाह ने आधी रात को अचानक हमला बोल दिया। इससे भगदड़ मच गई और हुमायूं को अपनी जान बचाने के लिए घोड़े समेत नदी में कूदना पड़ा।

2. गुप्तचर प्रणाली: “दुश्मन की हर चाल पर नज़र”

शेरशाह की सफलता का सबसे बड़ा स्तंभ उनका खुफिया विभाग था।

  • उन्होंने पूरे उत्तर भारत में सरायों का जाल बिछाया था, जो न केवल यात्रियों के रुकने की जगह थी, बल्कि ‘डाक चौकियों’ और ‘जासूसी केंद्रों’ के रूप में काम करती थी।

  • उन्हें हुमायूं के दरबार और सेना के हर मतभेद की खबर पहले से होती थी, जिसका वे मनोवैज्ञानिक लाभ उठाते थे।

3. सैन्य सुधार: “घोड़ों को दागना और हुलिया पद्धति”

अलाउद्दीन खिलजी के बाद शेरशाह ने सेना को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कठोर कदम उठाए:

  • दाग प्रथा: सरकारी घोड़ों की पहचान के लिए उन्हें ‘दाग’ दिया जाता था ताकि घटिया किस्म के घोड़े सेना में न मिलाए जा सकें।

  • नकद वेतन: वे अपने सैनिकों को जागीर के बजाय सीधे नकद वेतन देते थे, जिससे सैनिकों की वफादारी केवल बादशाह के प्रति रहती थी।

  • भर्ती प्रक्रिया: वे प्रत्येक सैनिक का व्यक्तिगत साक्षात्कार लेते थे और उनकी योग्यता के आधार पर पद देते थे।

4. छापामार युद्ध और किलेबंदी

  • शेरशाह ने ‘मारो और भागो’ (Guerrilla Warfare) की नीति का बखूबी उपयोग किया। वे सीधे युद्ध करने के बजाय दुश्मन को थकाने और उनके रसद (Supply) को काटने में माहिर थे।

  • उन्होंने रोहतासगढ़ जैसे अभेद्य किलों का निर्माण और सुदृढ़ीकरण किया, जो सैन्य दृष्टि से रणनीतिक केंद्र बने।

“शेरशाह ने मुगलों को उनकी अपनी ही जमीन पर उनकी कमजोरियों के जरिए हराया। उनकी रणनीति केवल बल पर नहीं, बल्कि संयम, सही समय के इंतजार और दुश्मन के मनोविज्ञान को समझने पर आधारित थी।”

 

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